शनिवार, 7 अगस्त 2010

सरहद

अरे! क्या हुआ...?, पूरे गांव में ये कैसा श्मशान सा सन्नाटा पसरा है, सब ठीक तो है ना पार्वती? अरे! कहां हो?

घर आ कुर्ते को आस्तीन से अलग करता पंकज एक कमरे से दूसरे कमरे किसी अन्जाने भय से भयभीत अधीर हो अपनी पत्नी को ढूढ़ रहा था, लेकिन पार्वती अंदर कमरे में दुबकी पलंग पर लेटी हुई थी। पंकज की आवाज सुन सहमी सी बरामदे तक आ गयी। बिटिया को आंचल में छिपाये एक कोर से चूहते पसीने को पोंछती थरथरायी आवाज में कहने लगी-

सुनो! घर से बाहर मत निकलना, दो गुटों में बलवा हुआ है।
बोलते हुये जिव्हा लड़खड़ा रही थी,अधर कांप रहे थे, आंखों में एक अजीब सी भयमिश्रित खामोशी थी, वह बेहद डरी हुई थी। बार-बार कभी आंचल से चेहरे का पसीना पोंछती तो कभी बिटिया के सुर्ख लबों पर ममता का दामन पसार ढाढस बंधाने का प्रयत्न करती।

क्या कहा? बलवा...? पंकज ने आंखें फाड़कर आश्चर्य से पार्वती की ओर देखते हुये कहा।अपने पैंतालीस बरस की उम्र में गांव में उसने आज तक हाथापाई तक ना देखी थी, ऐसे में बलवा जैसे शब्द उसके लिये दिन में किसी डरावने सपने से कम नहीं थे।

हां...।डरी हुई सिर हिलाती पार्वती ने कहा।

किनके बीच? क्या हुआ? सुबह जब घर से निकला तब तो गांव में सब ठीक-ठाक था, उसकी कौतुहल बढ़ते जा रही थी।

अब छोड़ो भी! बस, खा पीकर चुप सो जाओ ।

अरे! कौन है? क्या है? कुछ बताओगे भी! पंकज ने पुनः अधीर होते हुये कहा।

तुम पहले हाथ मुंह धो लो, फिर बताउंगी।वैसे भी दूसरों का अपने सिर पर मत लिया करो...जमाना खराब है ।

तुम तो ...बस पहेलियां बुझाती रहोगी...। रूको मैं दीनू काका से पूछता हूं, आज तक गांव में किसी ने बकरा नहीं काटा और तुम हो कि... तुम औरतो का तो एक हाथ खीरे का नौ हाथ बीज... वाली बात रहती है। अरे ! कुछ कहा-सुनी हेा गयी होगी और ...
ऐसा कहते हुये पंकज दरवाजा खोल बाहर निकलने का प्रयत्न करने लगा किंतु पार्वती तो जैसे बीच में दीवार बनकर खड़ी हो गयी ।

मैने कहा ना नहीं निकलोगे बाहर, तुम्हे मेरी सौगंध। तुम तो मुछमुण्डे की तरह बन जाते हो यार।एक हाथ से चैखट का उपरी सिरा और दूसरे हाथ से दरवाजे की सिटकनी पकड़ देहरी के बीचोंबीच खड़ी हो गयी।

अरे आखिर हुआ क्या? बताओगे भी।


अरे वो भोपू है ना ! उसके और कालिया के बीच खूब मारपीट हुई है। उन दोनो की लुगाई नल में पानी भर रही थी कि इसी बीच उनकी आपस में तू-तू, मैं-मैं हो गयी, उनके झगड़े में घरवाले कूद पड़े और बस फिर... क्या था, खूब लट्ठ, बल्लम चले, दौड़ा-दौड़ाकर एक दूसरे को पीट रहे थे। मैं तो खाली गुण्डी लेकर भागते हुये घर चली आयी... किवाड़ बंदकर अंदर दुबकी थी..., अभी दरवाजा खोला है...।वो लोग इधर ही दौड़ते हुये भाग रहेे थे ।


किस बात को लेकर कहा-सुनी हो गयी ?


अरे! तुम्हे तो मालूम है ना! एक तो बूंद-बूंद करके नल से पानी टपकता है, बड़ी मुश्किल से गुण्डी भर पानी तो सबको नसीब हो पाती है, तिस पर भी वो हरजाई कालिया की लुगाई पांच ले आयी थी, उसने भोपू की औरत को भरने नहीं दिया और झूमा-झटकी हो गयी।


उसके बाद अब तक तो फिर कुछ नहीं हुआ ना?


पता नहीं, मैं तो तब से घर के भीतर दुबकी पड़ी हूं। एक लंबी सांस खींचते हुये पार्वती ने पंकज से जब कहा तब उसके आशंकित चेहरे से एक अन्जाना सा भय साफ-साफ प्रतिबिंबित हो रहा था।

पंकज खामोश पास ही रखी खाट पर सो गया, पार्वती वहीं निकट जमीन पर चिंतित मुद्रा में बैठी हुई थी, उदास मन से कहने लगी- तुम्हे तो जब से कह रही हूं, चलो कहीं अन्यत्र चलें, बेवजह किसी झगड़े में उलझने की प्रतीक्षा करना ठीक नहीं, ये झगड़े- झंझट हम लोगों के बस का नहीं है, वो कहते हैं ना - मारे तो घर से गये, मरे ता जग से गये।सच पंकज... वैसे भी अभाव संघर्ष की जन्मदात्री होती है जो अपने अवसान के पीछे तबाही का एक मंजर छोड़ जाती है और मैं...ऐसे दिन नहीं देखना चाहती।


पंकज खामोश था अपनी पत्नी की बातों को गौर से सुन रहा था।


व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में सहजता से घर-बार नहीं छोड़ा करता, वह तो प्राणों के उत्सर्ग के कुछ क्षण पहले तक परिस्थितियों के अनुकूल हो जाने की आश लिये प्रतीक्षा करना चाहता है।लेकिन पार्वती अधीर थी, वह पंकज को विश्वास दिलाना चाहती थी कि अवसान की बेला समीप देखकर भी जो किसी दैवीय चमत्कार की बाट जोहते प्रतीक्षा करते हैं, ईश्वर उन्हे किंकर्तव्यविमूढ़ समझ संघर्ष में अकेला छोड़ देते हैं।महमूद गजनवी ने जब सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया तो ना जाने कितने लोग मूर्तियों से लिपट किसी चमत्कार की अपेक्षा करते रहे और गजनवी गाजर मूली की तरह सबको काटता हुआ स्वदेश प्रस्थान कर गया।


पार्वती ने फिर से पंकज की ओर देखते हुये कहा-

चलो ना! गांव छोड़कर दो महीनों के लिये कहीं दूसरी जगह चलें, यहां तो नदी, तालाब, पोखर सब बैसाख में ही सूख गये, पीने को गांव में बूंद भर पानी नहीं है। फसाद की जड़ इस सरकारी नल का हाल तो देख ही रहे हो, दस बार चलाओ फिर भी कटोरे भर नहीं निकलता। यही हाल रहा तो मर जायेंगे बिन पानी के। वैसे भी आधे से ज्यादा गांव वाले तो पहले ही कहीं-कहीं जा चुके हैं, बता रहे थे सैकड़ों फुट तक गांव में कहीं पानी नहीं हैं। पिछले हफ्ते से सरकारी दुकानों में पानी का वितरण शुरू हुआ है उसके लिये भी लूटमार मच जाती है, जितना मिलता है वह तो उंट के मुंह में जीरे की तरह है। चलो अब चलकर कहीं प्राण बचायेंा...। पार्वती ने जब निराश मन से पंकज के समक्ष यह प्रस्ताव रखा तो वह भी जैसे कुछ सोंचने पर विवश हो गया।


कहां जायेंगे पार्वती? चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, कहीं भी किसी गांव में पानी नहीं है ।

जहंा भी दो बूंद आसरा दिखेगा वहीं रह लेंगे। यहां तो खग, मृग, पशु, सब पहले ही या तो गांव छोड़कर चले गये या फिर परलोक सिधार गये। चलो यहां से प्लीज! धन-दौलत मोह माया सब इस शरीर के रहते तक है, यही ना रहा तो फिर काहे का गांव और अपनी धरती। दो-चार, दस-बीस घर ही तो बच गये हैं वो भी लड़मर के यहीं खप जायेंगे, पार्वती की आवाज में एक बेबसी भरा अनुरोध था ।

कहां जायेंगे? कहीं भी पानी नहीं है पार्वती, नदियों में पाईप लाईन बिछाकर जो पानी शहरों की ओर लाया जा रहा है, उसको भी लोगेां ने कई जगहों से काट डाला है, आदमी एक दूसरे के खून का प्यासा हो चुका है । गिलास भर पानी के लिये लोग एक दूसरे का खून बहा दे रहे हैं।बताओं ना ऐसे में ....।


तो मर जायें यहीं? क्या मरने के पहले कुछ भी प्रयत्न नहीं करोगे? बस डेढ़-दो महीने की ही तो बात है, जैसे ही आषाढ़ आयेगा, घर आ जायेंगे।


तो, तुम्ही बताओ ना कहां चलें? पंकज ने जैसे विवशता से पार्वती की बात स्वीकार कर ली थी।


चलो ना समुंदर किनारे किसी शहर की ओर चलते है। सुना है, सरकार इन शहरों में समुंदर के पानी को पीने लायक बनाने बड़ी-बड़ी फैक्ट्यिां लगायी हुई है। वहां पानी आसानी से मिल जायेगा।


ठीक है बताओ ना कहां चलें? पंकज ने अपनी पत्नी की ओर देखते हुये कहा।


चलो मुम्बई चलते हैं, कोई ज्यादा दूर नहीं है, बस दो महीने तो काटना है।

बात तो ठीक कह रही होे, पर...

पर...वर कुछ नहीं प्लीज!

बात तो  ठीक ही कहते हो...सही में एकाध के ... पंकज की आंखे भावना के रवों में बह हल्की-हल्की गीली हो रही थी

अब कोई अशुभ बात मत कहो..., जितनी जल्दी हो सके निकल चलें और मैं तो कहती हूं, कल शाम की गाड़ी से ही चले चलते हैं।

दोनो दूसरे दिन दोपहर के भोजन के उपरांत अपनी दस साल की बिटिया आशू को साथ ले मुम्बई के लिये निकल पड़े, लेकिन मुम्बई की राह इतनी आसान नहीं थी। वहां जाकर क्या खायेंगे, क्या पीयेंगे यह एक अहम् सवाल था और यही प्रश्न पंकज को लगातार खाये जा रही थी। पांच साल से धरती ने अन्न का एक दाना भी नहीं उगला था, बड़ी मुश्किल से सरकारी कोटे के राशन-पानी से तो गुजर चल रहा था, ऐसे में भीतर ही भीतर खोखला करती सोंच आखिरकार पंकज के जुबान पर आ ही गयी।


तुमने सोंचा है पार्वती, वहां क्या खायेंगे, क्या पीयेंगे? चिंतित पंकज ने अपनी पत्नी की ओर देखते हुये कहा।


जो भी मिलेगा, जैसा मिलेगा खा लेंगे, जहां मिलेगा रह लेंगे, वैसे भी जिनके पास रहने को कुछ नहीं होता, उसे फुटपाथ पर खुदा की नीली छतरी नसीब हो ही जाती है।पहले प्राण बच जायें फिर इज्जत और स्वाभिमान। वैसे मैंने एक बड़ी गठरी में दलिया और सत्तू रख लिये हैं, दो महीने चल जायेंगे। खाने की चिंता नहीं है, बस किसी तरह हलक की प्यास बुझ जाये- पार्वती ने सीट के नीचे गठरी की ओर इशारा करते हुये कहा।


मुम्बई के व्ही.टी.स्टेशन पर उतरते हुये रात के सात बज चुके थे। दोनों ने बाहर पास ही कहीं खाली जगह तलाशना शुरू किया लेकिन अंत में दो किलोमीटर दूर फुटपाथ पर बड़ी मुश्किल से खाली जगह नसीब हुई। वे सफर के दौरान पूरी तरह थक चुके थे, घर से लाये हुये जल की अंतिम बूंद को हलक के नीचे उतार वे तीनों पश्त हो जमीन पर लेट पैर पसार कर सो गये। आंते जब कुलबुलाती हैं तो जिव्हा स्वाद के नखरे भूल जाती है और आंखेंा में अकुलाहट हो तो उसे किसी मखमली सेज की जरूरत नहीं होती। लेटते ही क्षण भर में सभी को नींद ने अपनी आगोश में जकड़ लिया।


रात के लगभग १० बज रहे थे, अचानक बेटी आशू प्यास से रोने लगी, कहने लगी- पापा, प्यास लगी है, पानी दो ना..।


पंकज ने घर से लायी अपनी बड़ी पानी की जरेकिन उठाकर देखा तो उसमें बूंद भर पानी नहीं था, इधर-उधर ढूढ़ने का प्रयत्न किया पर ना तो वहां नल सदृश कुछ दिखायी दिया और ना ही कुछ समझ में आया। पास ही कंबल ओढ़कर सोये एक वृद्ध से दिखने वाले व्यक्ति को जगा उसने कहा- भाई साहब, यहां कहीं पानी मिलेगा? बिटिया प्यास से रो रही है।

उस अधेड़ से दिखने वाले व्यक्ति ने पंकज को गौर से देखा, किसी भय से जैसे चारो तरफ नजर दौड़ायी, फिर समीप आ धीरे से कहा- कहां से आये हो?

जी घोराडोन्गरी  से, भोपाल के पास है।

मराठी नहीं आती? उस व्यक्ति ने पुनः प्रश्न करते हुये कहा।

जी नहीं, केवल हिंदी आती है ।

क्यों आ गये यहां मरने के लिये...।

क्या करोगे भाई साहब! गांव में नदी-नाले सब सूख गये, इसीलिये बस प्राण बचाने यहां आये हैं।

ठीक है, पर यहां हिंदी मत बोलना, नहीं तो जिन प्राणों को बचाने के लिये इतनी दूर आये हो, वह बेवजह उखड़ जायेंगे।

वो देखो... शोर हो रहा है, लगता है गुण्डे, मवालियों की टोली इधर ही आ रही है। चुपचाप कंबल ओढ़कर सो जाओ, जब वो कुछ पूछेंगे तो जवाब मत देना। ये लो मराठी अखबार, सिरहाने में रखकर सो जाओ, इससे उन्हे लगेगा, तुम गूंगे जरूर हो पर मराठी जानते हो ।

पर बिटिया के लिये पानी...वो प्यास से रो रही है ।

उनको जाने दो, फिर जुगाड़ करेंगे, तब तक आंखों से गिरते आंसुओं से हलक की प्यास बुझाने को कहो।

थोड़ी ही देर में कुछ मवालियों की टोली सारे फुटपाथ को खंगालते हुये जोर-जोर से चिल्लाते हुये उन तक पहुंच गयी- आमची मुम्बई।

इथा कोन-कोन आहे ? कोन आये साला। कंबल खंींचते हुये एक लड़के ने पंकज से पूछा- तुमी पन मराठी मानुष?


हाथों से इशारा करता हुआ पंकज अपनी पत्नी और बच्चों के सामने बैठ अखबार को हिला-हिलाकर दिखाने लगा, जैसे वह उन्हे समझाने का प्रयत्न कर रहा था कि वो गूंगा जरूर है, पर मराठी है।


इसी बीच उस अधेड़ से दिखने वाले व्यक्ति ने उनके समर्थन में मराठी में कहा- ये लोग मराठी है भाउ, बेचारा बोल नहीं सकता।

ठीक आये, तुमी झोपुनसा ..., ऐसा कह कंबल को उनके उपर फेंकते हुये वे वहां से जाने लगे, तभी अनायास बिटिया फिर से रोने लगी और उसके मुंह से अचानक निकल पड़ा- पापा प्यास लगी है, पानी!

उस नन्ही सी बिटिया की आवाज मवालियों की उस टोली के पीछे चल रहे एक व्यक्ति को सुनाई दे गयी, उसने जोर से चिल्लाते हुये कहा- अरे! खेाटे मराठी मानुष।

मारो सालों को, मारो इस तरह जोर-जोर से चिल्लाते हुये वे सब उल्टे पांव लौट पड़े, उनकी भाषायें अब परिवर्तित हो चुकी थी। उस समय ऐसा लग रहा था जैसे अचानक बहेलियो की टोली को कोई  शावक का शिकार मिल गया हो, वे सब उस दंपति पर टूट पड़े । उस नन्ही सी बच्ची को उठा सड़क पर फेंक दिया, वह रोती बिलखती चिल्लाती रही- पापा...पापा ...पर उसकी चीख पुकार का उन शैतानेां की टोली पर भला क्या फर्क पड़ना था। वैसे भी जब कोई भीड़ हिंसा पर उतर आये तो वह इंसानियत का चोला उतार शैतान बन जाता है, मानवता उससे कोसों दूर पलायन कर जाती है। कहते हैं भीड़ सदैव विवेकहीन हुआ करती है और अगर यदि इसे राजनीतिक वरदहस्त प्राप्त हो जाये तो फिर यह पूरी तरह विक्षिप्त हो जाया करती है।


पार्वती अपनी फूल सी मासूम बच्ची को उठाने के लिये जैसे ही दौड़ी... कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया और गालों पर थप्पड़ों की बरसात करने लगे, पंकज को तो पहले से ही चार मवाली पकड़कर बेंतों से पीट रहे थे, वह बचाओ-बचाओ चिल्ला रहा था, लेकिन आसपास फुटपाथ पर सोये हुये भलेमानुष की शक्ल में नपुंसको को इससे क्या फर्क पड़ने वाला था ।

दर्द से कराहती वह नन्ही सी मासूम चिल्लाती रही- पानी पिला दो अंकल, बहुत प्यास लगी है।

तेरे बाप का घर है साली, अपना जमीन नंगा भूखा करके इधर दौड़े चले आये । पानी मांगती है, ऐसा कहते हुये एक ने फिर से पीटना शुरू कर दिया।

बच्ची का असह्य दर्द देख पार्वती हाथ छुड़ाने का प्रयत्न करती गिड़गिड़ाने लगी- भैया पानी पिला दो बच्ची को, प्यासी है ।

बेशरम, बेहया, शर्म नहीं आती, भिखारी बनकर आते हेा, अरे! तेरी इस नौटंकी को पानी पिलायेंगे तो हमारे बच्चे क्या पीयेंगे, पिला साले को गटर का पानी। उसका ऐसा कहना था कि उसके एक साथी ने सामने से एक बोतल उठा टूटे हुये गटर से पानी निकाल बच्ची के मुंह पर ठूंस दिया।

प्यास से तड़पती बच्ची के लिये तो वह गटर का पानी भी उस समय किसी गंगाजल से कम नहीं था।


पार्वती चिल्लाती रही, मत पीना बेटा, मत पियो... पर आशु तो एक ही झटके में पूरा गटक गयी।

वे सब लगातार उन दोनों को पीट रहे थे तभी पार्वती ने चिल्लाते हुये कहा- अरे! एक राजपुतानी के राखी पर मुगल सम्राट ने उस पर आक्रमण का विचार तक छोड़ दिया था, मैं जब से तुम्हे भैया कह रही हूं... छी! तुम लोग उससे भी गये बीते हो। अरे! तुम भी तो हिंदी में हमें गाली दे रहे हो, क्या फर्क है तुम्हारी और हमारी हिंदी में...।

पार्वती के मुंह से इतना सुनना था कि वे बौखला गये- मारो साली को, बहुत बोलती है।

और आखिर में वे तीनों जब लश्त पड़ गये तो एक पिंजरेनुमा गाड़ी में भरकर व्ही.टी.स्टेशन तक ले आये और कटक जाने वाली चलती गाड़ी में ठूंसकर चढ़ा दिये।

मार से लश्त रात भर ट्ेन के एक कोने में बैठ तीनों कराहते रहे। पंकज कभी पार्वती को ढाढस बंधाता तो कभी बिटिया के आंसू पोंछता अखंड भारत की इस विभाजित तस्वीर को देखकर रोता, कभी पीठ पर पड़े बेंतों के लंबे-लंबे निशान को पास ही खिड़की पर लगे कांच पर उभर आयी प्रतिबिंबों से देखने का प्रयत्न करता तो कभी सूजे हुये पैर में, कराहती मानवता को गहराई से महसूस करता। इस बेइंतहा दर्द के पश्चात भी वह चुप था, जानता था कि उसकी जरा सी उफ उन दोनेां को तोड़कर रख देगी।

रात जैसे-तैसे बीती तो दिन के उजाले में भी आशा की कोई किरण दूर-दूर तक दिखायी नहीं दे रही थी, कहां रहेंगे, कहां जायेंगे जैसे प्रश्न अनिर्णित रूप में किसी हल की आश लिये अभी भी मुंहबांये खड़ी थी। रास्ते में विचार आया कि यदि किस्मत गाड़ी के सहारे कटक ले जा ही रही है तो क्यों ना वहीं नजदीक ही पुरी जा जगन्नाथ जी के चरणों में स्वयं को अर्पित कर कुछ दिनों के लिये शरण मांगे । वैसे भी जाने कितने लोग मंदिर के प्रसाद और दर्शनार्थियों के जूठन खाकर बरसों जिंदा रह लेते हैं तो फिर उन्हे तो बूंद भर पानी मात्र चाहिये थी, वह भी महीने दो महीनों के लिये।


बंगाल की खाड़ी से उठती हुई तूफानी हवायें मौसम को आर्द्र कर रही थी, हल्की-हल्की उमस से बदन चिपचिपा हो रहा था, लग रहा था जैसे कटक स्टेशन समीप आ चुकी है। फिर भी स्टेशन पहुचंने में अभी लगभग आधे घण्टे का विलंब था कि सादे लिबास में कुछ लोग डंडा पकड़ चढ़ने लगे, पंकज और पार्वती तो उन्हे देख डर के मारे कांपने लगे, उन्हे एक बार फिर मुम्बई की याद ताजा हो आयी। उन्हे शंका होने लगी, जब उनसे रहा नहीं गया तो पास ही बर्थ पर बैठे एक सज्जन से उन्होने पूछ ही लिया- भाई साहब! क्या ये पुलिस के लोग हैं?


नहीं-नहीं, ये उड़िया स्वयंसेवक हैं,ये अपनी सरजमीं की रखवाली के निये जान भी दे देते हैं । ये घूम-घूमकर पता लगाते हैं कि कोई गैर उड़िया उनकी धरती पर कदम रख इनके संसाधनों में बंटवारा लेने का प्रयत्न ना करे।

क्या आप भी यहीं के रहने वाले हैं?


जी हां ।

पर आप तो...

जी-जी, वास्तव में मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हूं, मेरा घर यहीं है, गर्मी की छुट्टियां बिताने घर जा रहा हूं, वैसे भी उधर गर्मियों में पानी की बहुत किल्लत रहती है।

बात अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हो पायी थी कि कटक स्टेशन पर गाड़ी घीरे-धीरे खड़ी होने लगी, उससे वे कुछ और पूछ पाते कि वह उतरने वालों की लंबी कतारों में कहीं गुम हो गया । स्टेशन पर जब गाड़ी खड़ी हुई तो जोर-जोर से कुछ आवाजें सुनाई दे रही थीं, गौर से सुनने पर पता चला कि विभिन्न भाषाओं में एनाउन्समेंट हो रहा है, कोई सिरफिरा जोर-जोर से चिल्लाता हुआ कुछ कह रहा था। जब हिंदी में कुछ आवाजें आयी तो पंकज और उसकी पत्नी कान लगाकर बड़े ध्यान से सुनने लगे, वे जोर-जोर से कह रहे थे- कृपया कोई भी गैर उड़िया मृत्यु को दावत देने के लिये कटक की धरती पर उतरकर यहां के संसाधनों में बंटवारा ना लें। हम मौत के सौदागर नहीं हैं लेकिन हमारे हिस्से की रोटी और जल कोई छीनने का प्रयत्न करेगा तो हम उसे बर्दाश्त भी नहीं कर पायेंगेें, यदि कोई ऐसा पाया गया तो वे अन्जाम भुगतने के लिये तैयार रहें ।

उनकी बातें सुन वे डर के मारे एक बार फिर से कांपने लगे, दूध का जला छांछ भी फूुककर पीता है, पार्वती ने धीरे से कहा- चलो यहां से, यहां नहीं उतरेंगे।


किसी देश के भीतर ही जहां भाषा की सरहदों से सीमा की रेखायें खींची जाती हों वहां मौत किसी बूचड़खाने में बिकने वाली मांस की तरह होती है। अब तो पंकज पूरी तरह टूट चुका था, वह निराश मन से पत्नी से कहने लगा- चलो पार्वती! जहां जिस्म के रंगों और भाषाओं में मानवता कैद होती है वहां मृत्यु का कोई भरोसा नही।

वे वहां से किसी अन्यत्र स्थान की तलाश में निकल पड़े किंतु उनके सामने अब भी यक्ष प्रश्न यही था कि वे बचे हुये डेढ़ महीने कहां काटे। हताशा के उन क्षणों में ना तो उनके सामने बहुतायत में विकल्प थे और ना ही देश की तात्कालिन राजनीतिक व्यवस्था में फटी-चिथड़ी मानवता की तुरपाई करने की कूबत ही थी। काफी सोंच विचार के पश्चात थक-हार उन्होने कुछ दिन चेन्नई में बिताने का निर्णय लिया और इस तरह वे ट्ेन के रूट में थोड़ा परिवर्तन कर चेन्नई के लिये रवाना हो गये। चेन्न्ई का विकल्प चुनने के पीछे जहंा महज पार्वती की जिद्द  थी , उसे विश्वास था कि उसका रूपरंग दक्षिण की भौगिलिक जलवायु से मेल खाती जिस्म के रंगों से पूरी तरह ना केवल अनुकूल है , अपितु उस भीड़ में इतनी सहजता से उन्हे पहचान पाना संभव भी नहीं ।

चेन्नई स्टेशन पर उतरकर सबसे पहले पार्वती ने गजरा खरीदा और नाक के बांये तरफ को छिदवा एक कील पहन ली,वह उस समय बिल्कुल तमिल स्त्री की तरह लग रही थी। कहते हैं यदि मातृभूमि छोड़ने से प्राणों की रक्षा हो सकती हो या भेष बदलने से तात्कालिक क्षणों में संकट का निवारण हो सकता हो तो व्यक्ति को रंच मात्र भी सन्कोच नहीं करना चाहिये। पार्वती ने इन उसुलों को जैसे बचपन से रट्ट घंोंटकर पी लिया था।


आंतों की अकुलाहट और हलक से उठती प्यास से जिव्हा अकुलाने लगी, कुछ देर आराम करने के पश्चात पार्वती वहीं जमीन पर आंतों में उठती असह्य दर्द को छिपाती लेट गयी। पत्नी का दर्द बहुत देर तक जीवनसाथी से छुपकर भला कहां रह सकता है, पार्वती के दर्द को पंकज महसूस करने लगा था, उसने अपनी पत्नी के हाथों को अपने हाथों में लेते हुये कहा - तुमने तीन दिनों से कुछ खाया ना पीया, सिर्फ हम दोनांे को खिलाते रहे, खा लो प्लीज!


नहीं पंकज मैं उपवास हूं।


तीन दिनों तक ?

हां पंकज, आंते विवशता की भाषा भले ना समझती हों पर आस्था के समक्ष नतमस्तक हो जाती हैं, और फिर तुम दोनों ने खा लिया, समझो मेरा पेट भर गया।


पार्वती की बातें सुन पंकज की आंखें नम हो आयीं, पर उनकी बातों से अन्जान अनंत आकाश को निहारती उस नन्ही बालिका के लिये भाषा की सरहदें और भौगाोलिक सीमाओं के बीच दम तोड़ती मानवीय मूल्यों के भला क्या मायने थे? वह दिन भर की उमस और गर्मी से फिर एक बार प्यास से तड़प उठी।प्रश्न फिर से वही ंथे और उसकी इस बार की इच्छा भी किसी गुड्डे, गुड़ियों जैसे खिलौनों या तमंचे की ना होकर महज पानी की कुछ बूदों की थी । वह नितांत अबोध नहीं थी, वह जानती थी कि इसी पानी की उसकी तीव्र इच्छा ने उसके माता-पिता की किस तरह दुर्दशा की थी, किस तरह बेंतों की मार से पापा की डबडबायी आंखे अब भी खामोश होकर कुछ कह रही हैं।वह बहुत देर तक तो प्यास को भीतर दबाकर रखी लेकिन उसकी सहनशक्त् िकी भी एक सीमा थी, रोकने की तमाम कोशिशों के बावजूद आंसू की कुछ बूंदे बाहर छलक ही गयी।


संतान की पीड़ा मां से भला कहां छिपी रह सकती है, उसके आंसुओं की भाषा समझते उसे देर ना लगी।

बेटी, प्यास लगी है?पार्वती ने अपनी बिटिया के आंसुओं को आंचल से पोंछते हुये पूछा?


आशू ने जब सिर हिलाकर हां कहा तो जैसे आंखों में देर तक रूकी सारी बूंदे किसी बारिश के पानी की तरह तुरतुराकर बहने लगीं।

देखो तो कहीं पानी दिख रहा ? पार्वती ने चारो तरफ नजर दौड़ाते हुये पंकज से पूछा।

यहां तो कहीं पानी नहीं दिख रहा, मैं बाहर कहीं देखता हूूं, ऐसा कहते हुये वे प्लास्टिक की बोतल उठा जाने लगे तभी पार्वती ने अचानक उत्तर की ओर लगी भीड़ की दिशा में इशारा करते हुये कहा-

ओ देखो, लंबी-लंबी कतारे ! लगता है वहां कोई जल वितरण व्यवस्था है, शायद हमारे इधर की तरह सरकारी व्यवस्था होगी, देखो तो शायद वहां मिल जाये। नहीं-नहीं, तुम मत जाओ, तुम यहीं रूको... तुम बच्ची का ध्यान रखना, मै जाकर देखती हूं।


वह भीड़ बहुत दूर नहीं थी, पार्वती भी उसी कतार में जाकर खड़ी हो गयी। उस समय वह बिल्कुल तमिल वेशभूषा में थी और उसे उन सबसे अलग पहचान पाना बेहद कठिन था। अपनी बारी का इंतजार करती बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा कर रही थी, वह देख रही थी कि खाकी वर्दी पहना सरकारी मुलाजिम जल वितरण करते हुये उनसे तमिल में कुछ बातें भी कर रहा था। जब पार्वती की बारी आयी तो उस व्यक्ति ने उससे भी तमिल में कुछ पूछा, लेकिन वह अन्जान सी खड़ी रही। जब फिर से उसने कुछ पूछा तो इशारे में हाथ हिलाते हुये यह बताने की चेष्टा करने लगी कि वो बड़ी दूर से आयी है। उसके इशारों से उस व्यक्ति को शक हो गया, उसने जल के पेकेट में लिखे कुछ अक्षरों को पढ़ने के लिये हाथ बढ़ाया तो पार्वती की समझ में आ गया कि यहां भी व्यक्ति की पहचान शायद भाषाओं से होती है। उसने छोटी-मोटी तमिल का उपयोग करते हुये अपनी भाषा में कहा- अन्ना पानी दे दो प्लीज़! बिटिया प्यास से रो रही है।


उस व्यक्ति का इतना सुनना था कि वह गुस्से से आगबबूला हो गया उसने  दुत्कारते हुये उसे वहां से भगा दिया, वह खाली हाथ लौटकर आ पंकज के पास निराश होकर बैठ गयी।

क्या हुआ नहीं मिला पानी?

मत पूछो पंकज चलो, वापस घर चलें ।

पार्वती , अब कहां जाओगे, पहले बिटिया के पानी की व्यवस्था करेा, प्यास से तड़प रही है, मर जायेगी।रूको मैं देखता हूं, ऐसा कह उन्होने भी कुछ  करने की चेष्टा की लेकिन अंततः निराशा ही हाथ लगी, थक हारकर वह भी खाली हाथ लौट आया।

उसी समय पार्वती की नजर किसी आगन्तुक की प्रतीक्षा कर रही एक संभ्रांत महिला पर पड़ी- उसने उनसे अनुनय करते हुये कहा- बहन जी, पानी प्लीज ला दो, हमें कोई  यहां पानी नही दे  रहा, बिटिया प्यास से तड़प रही, पति भी प्यास से लश्त हो चुके हैं।

तू इधर काहे को आया- उस स्त्री ने प्रश्न करते हुये पार्वती से कहा।


बहन जी अब हमें क्या मालूम था...पानी ला दो प्लीज़ फिर अब की बार लौटकर नहीं आयेंगे।


हम तुमको पानी देगा और साथ में भोजन भी देगा जितना दिन रहेगा, पर तुमको हमारा एक बात मानना पड़ेगा- वह स्त्री टूटी फूटी हिंदी में बोल रही थी।



उस स्त्री में आशा की किरणें देख पार्वती की आंखों में एक अनोखी चमक आ गयी, पंकज भी पुलकित नयन से उसकी ओर अपलक निहारने लगा।

हां बहन जी बोलो ना, कहो प्लीज़! मैं आपकी जिंदगी भर गुलामी कर लूंगी, मेरे पति और मेरी बिटिया के प्राणों की रक्षा कर दीजीये, बस। मैं आपका अहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी- वह हाथ जोड़ गिड़गिड़ाने लगी।

नहीं हम तुमको क्या करेगा, हमको तुम्हारा बेटी चाहिये, बोलो देगा?

बहनजी क्या करेंगी, मेरी बेटी का... क्या आपकी कोई बेटी नहीं है, अपनी बेटी समझकर पालना चाहती हैं, तो रख लीजीये पर प्राण बचा दीजीये , आखिर यशोदा भी तो मां की तरह होती है। मैं देवकी बन आपकी गोद में अपनी बेटी को निहार लूंगी।


नहीं, मेरा कोई संतान नहीं है, तुम्हारा बेटी को हम मंदिर में चढ़ायेगा, पंडित ने कहा है, जब हम कोई देवदासी चढ़ायेगा तब हमारा कोई बच्चा होगा।

नहीं बहनजी, ऐसा अनर्थ मत कहो, वो तो नन्ही सी मासूम है, जिसने अभी दुनिया देखी नहीं है, गुड्डे, गुड़ियों के खेल में संसार का स्वरूप ढूंढ़ती उस बच्ची को दुनियादारी क्या मालूम? आप ही मां बनकर इसे पाल लीजीये, आपका प्यार मिलेगा, तो धीरे-धीरे मुझे खुदबखुद भूल जायेगी।


नहीं, हम जो बोला, वो मानेगा, तभी हम तुमको पानी देगा, नहीं तो...।


वह असहाय सा निरूत्तर अपने पति की आरे देखती रही... पंकज की आंखों से आंसू की अविरल घारा बहने लगी, उसने रूंवासे स्वर में कहा- पार्वती हां कह दो, बेटी कहीं भी हो जिंदा तो रहेगी, प्राण उखड़ गये तो किस काम का...।


पंकज की सहमति पा, उस महिला की बातों में भारी मन से पार्वती ने हामी भर दी और अपने कलेजे के टुकड़े को उस स्त्री को सौंप दिया। वह उस स्त्री को सौंपते हुये आशू को छाती से चिपका थोड़ी देर बिलखकर रोती रही लेकिन एक मां का वात्सल्य तो हर हाल में अपने संतान की सलामती चाहता है चाहे वह उसके पास रहे या फिर दूर।


वह महिला उस बच्चे को पाकर प्रफुल्लित हो गयी और पानी से भरे एक बड़े प्लास्टिक बेग को उन्हे सौंपते हुये ढेर सारा खाने का सामान छोड़ चली गयी। बच्ची अपनी मां से विलग हो चिल्ला-चिल्लाकर रोती रही, लेकिन वह स्त्री उसे उसी क्षण कार में लेकर वहां से निकल गयी ।

बड़े प्लास्टिक की थैली में पानी से भरा बेग पास ही रखा था, एक गिलास में पानी निकालते हुये पार्वती ने कहा- लो पानी पी लो।

नहीं पार्वती मुझसे यह पानी पीया नहीं जायेगा, यह तो मेरी बिटिया की कीमत है।ऐसा कहते उसकी आंखो से बहती हुई आंसू की बून्दे खुले मुंह में धधकती जीवित मुखाग्नि को शांत करने का प्रयत्न करने लगी। बिटिया बेचकर जल की यह बूंद ... हे भगवान! मौत क्यों नहीं आ गयी, ये दिन दिखाने से पहले। वह रो-रोकर चिल्लाता रहा ।

एक पुरूष की आंखों से जब आंसू की बूंदे छलकती हैं और उसके साथ मुख से कुछ शब्द पीड़ा में प्रस्फुटित होते हों तो वह बड़ा ही हदयविदारक क्षण होता है,पुरूष ऐसे ही अकारण नहीं रोता, लेकिन जब रोता है तो ....

पी लो प्लीज... अपनी बिटिया तो खेा ही चुकी अब मैं और ...

क्या होगा, मर जायेंगे ना! इससे ज्यादा और क्या होगा, यह भी... किसी मरने से कम थोड़े ही है, तिल-तिलकर पश्चाताप के आंसू के साथ जिंदगी भर मरने से तो अच्छा था एक ही बार मर जाते, पर ये कमबख्त मौत भी जब बुलाओ तो कहां आती है।

वे दोनेा कुछ दिन तक भूखे-प्यासे सड़क पर तड़पते पड़े रहे लेकिन जब सब कुछ असह्य हो गया और पार्वती ने भी जब अन्न जल का पूरी तरह त्याग कर दिया तो पंकज के सामने उस स्त्री के दिये टुकड़ो पर गुजर करने की विवशता हो गयी।कुछ दिन तो बस जैसे-तैसे घुट-घुटकर जीते हुये उस महिला की दी भीख पर दोनो गुजारा करते रहे, लेकिन महीने-डेढ़ महीने पश्चात वह भी अब खत्म होने की कगार पर आ गया था।

चलो ना! अब घर चलें, आषाढ़ का एक पखवाड़ा बीत गया, उम्मीद है हमारी धरती पर भी अब इन्द्र की कृपा हो गयी होगी। पार्वती ने रोते हुये कहा।


हां पार्वती, तुम ठीक कहते हो, चलो! मैं भी एक-एक क्षण को जैसे युगों की तरह यहां काट रहा हूं।

देख लिया ना अपना घर छोड़ बाहर भटकने का फल ।


मुझे क्या मालूम था पंकज कि पूरी धरती भाषा और कौम की सरहदों में बंट चुका है, यहां तो जैसे हर गांव एक रियासत हो गया और हर कस्बा एक वतन। चलो! अब कहीं नहीं जायेगे।अपने ही गांव की धरती को सबके साथ मिलकर मेढ़बंदी करेंगे, अपनी धरती से एक बूंद पानी बाहर नालों में नहीं बहने देंगे।

हंा पार्वती, अपनी पड़ती जमीन को मैं इस बार इस बार तालाब और पोखर बना पानी से लबालब कर दूंगा और सचमुच ऐसी जगह पर हम दोबारा लौटकर नहीं आयेंगे, यहां तो पूरा देश भाषाओं की सीमारेखाओं में बंट चुका है। - पंकज ने उदास होकर जब कहा तो एक असह्य पीड़ा उसके चेहरे से साफ झलक रही थी।


दोनो गठरी उठा निकल पड़े फिर से उस सफर को, एक असह्य पीड़ा के दर्द को समेटकर । सफर भर वे सिसकते रहे लेकिन उनकी सिसक की गूंज सत्ता के उस गलियारे तक भला कहां पहुंच पाती जो समरसता की जड़ों को खोदकर स्वयं के लिये सत्ता की नींव खड़ा किया करते हैं। वैसे भी राजनीति एक वेश्या की तरह होती है जिसे वरण करने वाला व्यक्ति उसी वेश्यागामी पुरूष की तरह हो जाता है जिसके लिये नैतिकता और मानवता जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं।


दो दिन के सफर के उपरांत घर आ खाट निकाल बाहर बरामदे में वे बैठ गये बस कुछ सोंचते-विचारते एक धधकती ज्वाला को अंदर में समेटे हुये। बेटी की याद में बहते हुये आंसू अधरों की मूक व्यथा को स्वयं में समेटकर हदय की धधकती प्रतिशोध की ज्वाला को शांत करने का प्रयत्न कर रही थी, किंतु वह तो अग्निकुंढ में पड़े घृत की भांति उसे और अधिक तीव्रता से प्रज्जवलित कर दे रही थी।


अपना तो सब कुछ लुट गया ना पंकज...।पार्वती ने रोते हुये कहा।


पंकज खामोश था आखिर वह कहता भी क्या, स्त्री की ममता जब रोती है तो पुरूष के सामने खामोशी के सिवा कोई विकल्प नहीं होता, वह अपने सिसकते अधरों के सहारे शब्दों को मुखरित करने का प्रयत्न करता रहा किंतु वह भी उस सेमय बेमानी से हो गये ।


पार्वती नहा-धो भोजन बना पंकज के लिये थाल सजाकर खाने के लिये रख दी, बड़े दिनों के पश्चात घर की रोटी और दाल देखने का मिल रही थी।


लेकिन भोजन का निवाला इतनी जल्दी भला कहां हलक के नीचे उतरता है, वह सामने थाल को रख बैठा हुआ पानी की कुछ बूंदे फेर अर्चना कर ही रहा था कि अचानक उसी क्षण फिर जोर-जोर से शोर होने लगा- पार्वती डर गयी वह हांफते हुये फिर से बाहर निकली - सहमी हुई भागते लोगों से पूछने लगीं- क्या हुआ भैया, फिर क्या लफड़ा हो गया?

अरे भाभी, वो भोपाल से चेन्नई जाने वाली ट्ेन पटरी से उतर गयी है, कोई सरकारी राहत अभी तक नहीं पहुंच पायी है। बच्चे, बूढ़े, महिलायें सभी पानी और भोजन के लिये तरस रहे हैंै, बच्चे रोते हुये चिल्ला रहे हैं।


हूं..., कहते हुये वह उल्टे पांव लौट आयी ।


क्या हुआ पार्वती किसको इस तरह उलाहना दे रही हो ।

अरे ! कुछ नहीं, रामू बता रहा था, भोपाल से चेन्नई जाने वाली ट्ेन पटरी से उतर गयी है, बता रहे थे लोग भूख, प्यास से तड़प रहे हैं। आखिर ईश्वर सबको करनी का फल तो देता है ना!

क्या कह रही हो तुम, ऐसा नहीं कहते पार्वती, किसी को कुछ हुआ तो नहीं ना? पंकज जैसे अधीर हो गया था।

नहीं, कुछ नहीं हुआ।

चलो पार्वती, हम भी चलें और ऐसे संकट के समय उनकी मदद करें।

नहीं, मैं नहीं जाउंगी, हमने इन्ही जालिमों की जमीं पर अपनी बेटी खोयी है।

ऐसा नहीं कहते पार्वती, मैं एक मां का दर्द समझता हूं, पर ...यह ठीक नहीं है। यह वही धरती है जिसने यवनों, कुषाणों, मुगलों और ना जाने किन-किन को अपनी छाती पर बिठाकर स्नेह से सींचा, पल्लवित किया। अतिथि देवो भवः हमारी पहचान है, इसे मत खोओ प्लीज़! जो हुआ उसे भूल जाओ, हम अपनी पहचान खो देंगे तो कौन पहचानेगा इस भारत को, जिसकी अनेकों माताओं ने दुश्मन को भी अपनी छाती का दूध पिलाया है, फिर तो ये अपने हैं।


चलो जो भी हमारे पास है, ले चलो, प्लीज! ऐसा कहते हुये अपने लिये निकाली भोजन की थाल और बाल्टी भर पानी ले निकल पड़े ।

पार्वती असमंजस सी खड़ी कुछ दूर तक उन्हे देखती रही, फिर वह भी निकल पड़ी घर के समस्त पके भोजन को एक बड़े बर्तन पर रख गुण्डी भर जल के साथ, अपनी असह्य पीड़ा को सिरहाने पर वहीं आंसुओं के साथ छोड़ उनकी मदद करने।

10 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

राकेश जी,
आगे आने वाले हालात का ऐसा खाका खींचा है आपने कि रोंगटे खडे हो जायें ………………हमें पानी की एक एक बूँद् की कीमत समझनी होगी वरना वो दिन दूर नही जब ऐसे ही हालात से दो चार होना पडे………………आप की कहानियों मे गहरी पीडा के साथ भविष्य दर्शन भी होता है जो इंसान को सोचने पर मजबूर करता है मगर आज के युग मे सभी इतने स्वार्थमय हो गये हैं कि भविष्य नही देख पा रहे और नही सोच पा रहे कि हमारी आने वाली पीढियों के लिये हम क्या धरोहर के रूप मे देकर जा रहे हैं ।
देश,भाषा और जाति के नाम पर बाँटने कि नौबत ना आ जाये उससे पहले सभी को समझना होगा नही तो अंजाम के लिये तैयार रहना होगा…………एक बहुत ही सुन्दर संदेश देती कहानी ज़िदगी की हकीकत है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी कहानी पढ़कर तो प्रेंचन्द के पात्र याद आ गये!
--
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

वन्दना ने कहा…

अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (9/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कहानी मार्मिक है ....भाषा के लिए राज्य का बटवारा ....इतनी भीषण स्थिति तो नहीं आई है जैसा उल्लेख आपने किया है...रोंगटे खड़े कर देने वाला कथानक ...

shama ने कहा…

Uf! Aapki ye kahani padhke to dil dahal gaya!

निर्मला कपिला ने कहा…

कहानीकार की यही पहचान है कि आने वाले समय को चेतना मे रख कर ऐसा खाका बुनता है कि पढने वाला वाह वाह किये बिना नही रहता। सच मे ऐसा समय आने वाला है। इस कहानी का कथानक बहुत अच्छा लगा। मेरी कहानियों मे भी बहुत गलतियाँ होती हैं जो शायद कई बार खुद को पता भी नही चलती लेकिन पाठकों की प्रतिक्रियायें पा कर सुधार लेती हूँ। इस लिये मै खुद भी कमेन्ट करते हुये सुझाव देना पसंद करती हूँ इसे अन्यथा न लें\ इस कहानी मे भी एक सुझाव है कि जो कहानी मे वार्तालाप है उसे कोमा मे कहें। ये कहानी हर लिहाज मे काबिले तारीफ है। आने वाले समय से लोगों को सचेत करती है। यही कहानी की विशेशता है। बधाई।

Vivek VK Jain ने कहा…

nice post.....
happy independence day!

sandhyagupta ने कहा…

जो आप कहना चाहते थे इस कहानी के माध्यम से बखूबी कहा.यूँ ही लिखते रहिये.

KK Yadava ने कहा…

बहुत खूब लिखा आपने...सार्थक सन्देश...सुन्दर पोस्ट...बधाई.

अशोक मिश्र ने कहा…

बहुत खूब क्या लिखा है आपने .....
सार्थक सन्देश अति सुन्दर ........