शुक्रवार, 19 नवम्बर 2010

दरख्ते रिश्ते

दुग्ध धवल सा रात्रि का प्रथम प्रहर चंद्रमा की चंचल किरणों से अठखेलियां कर रहा था।रोज की तरह आज भी जमींदार के  चौपाल पर चौसर की बिसात बिछी हुई थी, पर जमींदार का मन चौसर के खेल में लग नहीं रहा था।कभी वह खिसियाया हुआ मन ही मन भुनभुनाता अंदर जाता, तो कभी चिंता की लकीरों को अपने चमकते भाल पर समेटता हुआ चैपाल पर आकर बैठ जाता। वह न तो घर पर आये चौसरिये  मेहमान को अपनी चिंता से अवगत कराने का साहस जुटा पा रहा था और न ही बीस बरस साथ बिता लेने के पश्चात लुगाई को उसके हाल पर छोड़ देने की हिम्मत।मन अधीर था तो शरीर की बेचैनी से कांपता बदन युवावस्था के निर्गमन का जैसे संकेत सा दे रहा था।इसी उहापोह में वह थोड़ी दूर खड़े अपने बड़े बेटे गोपू को बुलाकर कहा -



अरे गोपूू जरा इधर तो आ।



हां बाबूजी, बोलो।गोपू ने पास आकर कहा ।



अरे जरा जाकर घर के अंदर तो देख, देख तेरी मां की हालत अब कैसी है? जब से शहर से आया, कौड़ी भर का काम नहीं। दिन रात इधर-उधर की लट्ठमारी से तुझे फुर्सत ही नहीं मिलती।कहां गया था सुबह से? अरे! अब बड़ा हो गया है, घर की जिम्मेदारी सम्हाल। तेरी उमर में मैने पूरे गांव की पटेलगिरी सम्हाल ली थी। जमींदार ने एक कोने में ले जाकर अपने बड़े बेटे गोपू से अंाख लाल करते हुये कहा।



बाबूजी! आप भी गजब करते हैं, छोटी-छोटी बात पर बेवजह चिल्लाने लगते हैं। अरे आज सुबह से मै पान के ठेले तक भी नहीं गया हूं और आप हैं कि...।



जमींदार ने दबी जुबान से गोपू को डांट लगाते हुये कहा-हंा-हां बस कर बहुत जुबान चलाता है, तुझे तो कुछ बोलना ही पाप है।थोड़ा सा बोल क्या दो, मुंह तो बस कैंची की तरह चलती है। ये सब तेरी मां का करा धरा है वरना...।



वरना क्या? आज तक इन तास चौपड के अलावा कभी फुर्सत मिली है आपको! चार लोगों को बिठा लिया और गप्पें मारने के अलावा कुछ और काम तो है नहीं आपके पास। गोपू ने आंख-भौं सिकोड़ते हुये कहा।



तू बस भी करता है या फिर ...। अरे जरा तेरी मां को तेा देखकर आ जा...।



अरे, कह तो रहा ना! थोड़ी देर पहले मैं वहीं था।अब आपको कैसे समझांउ? काकी कमरे के अंदर मां के पास बैठी है, कमरे में किसी को जाने से मना किया है। अब आप ही बताओ, ऐसे में क्या मै दरवाजे पर बैठकर ढोल नंगाड़े बजाउं। गोपू ने लंबी खीझ भरते हुये कहा।



हां बस-बस, ठीक है। यहीं रहना, बस इतना ही कह रहा हूं।







जमींदार काशीनाथ के अंदर का गरम खून जैसे मानो उबल पड़ा था। वह सोंच रहा था यदि इसी तरह की जुबान गांव के किसी आम आदमी ने चलाई होती तो उसकी चमड़ी उधेड़ कर रख देता।साले की जुबान खींच देता, ऐसा मारता कि उसकी सात पीढ़ीयां घर के दरवाजे पर आने के पहले सौ बार सोंचती।पर जवान बेटा कुछ बोलने पर उल्टा सीधा कर बैठा तो जिंदगी भर किस्मत पर रोने के अलावा कुछ नहीं रहेगा।अपनों का मारा कहां मुंह दिखाये, कुछ ऐसी ही हालत जमींदार काशीनाथ की थी। आदमी की किस्मत में शायद यही होता है, जो लाखों दिलों पर राज करता है, वह घर की उपेक्षा का शिकार होता है।जो सैकड़ों पर हुकुम चलाता है, उसी के नाक तले उसके आदेशों की अवहेलना होती है।जिनकी खुशी के लिये वह दूसरों को सताता है वही उसकी खुशियों को अंत में तार-तार कर देता है।



जमींदार के पैर की जूती गोपू के पैर के बराबर हो चुकी थी।काशीनाथ इस बात को समझता था कि जवान होते बेटे से टकराना बुद्धिमानी की बात नहीं।शायद इसी कारण वह कुछ खिसियाया सा चुप हो गया।जमींदार और गोपू के संबंध लगभग वैसे ही थे जैसा पुराने जमाने में राजा और विद्रोही युवराज के बीच हुआ करते थे। गोपू को यह बात नागवार गुजरती कि उसकी पिता की छत्रछाया उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में बाधक है जो उसकी कद काठी को न केवल कम करता है बल्कि उसकी महत्वाकांक्षाओं का यदा-कदा दमन भी करते रहता है ।



जमींदार मन ही मन बुदबुदाते हुये अतीत की उन स्मृतियों में खो गया, जब एक पिता के सामने अदब और तहजीब से पेश होना पुत्र एवं परिवार के संस्कारिक होने का प्रमाण माना जाता था।वह अपने युवाकाल की उन यादों का स्मरण करने लगा जब वह खुद पिता के सामने चालीस बरस की उमर तक सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था।मां के लाख कहने पर कभी एक साथ भोजन परोसा जाता तो जैसे एक निवाले गटकने में गिलास भर पानी कम पड़ जाता जाता। गोपू की मां तो जैसे कभी पिता के अंतिम सांस तक खाट के नजदीक आने की हिम्मत ही नहीं जुटा पायी। वह सोंच रहा था, एक वह काल था जब पिता के साथ बड़े सम्मान एवं सलीके से पेदा हुआ जाता था और आज लड़कोें को पिता ही नहीं बड़ों के साथ बात करने की तहजीब नहीं।



काशीनाथ इन बदली हुई परिस्थितियों के लिये तेजी से हो रहे सामाजिक परिवर्तन को कसूरवार ठहराते हुये चैपाल पर बैठ प्रायः कहा करता- ये रैयत के लौंडन, दिल्ली, मुम्बई कमाये-खाये जा गांव बिगाड़ दियैन। बड़े-छोटन के सब लिहाज भुलाई दिहीन।



दरअसल पिता-पुत्र के बीच की वैचारिक समझ की शून्यता तथा उनके बीच सामंजस्य और विचारों के साझेदारी का अभाव किशोर मन पर विद्रोह की अनगिनत लकीरें खींचता है, जिसका खामियाजा हर पिता अपने पुत्र की उपेक्षा के रूप में वृद्धावस्था में भुगतता है परंतु कदाचित जमींदार इन सबसे ना केवल बेखबर था अपितु चैसर के खेल से उसे इतनी फुर्सत ही ना मिली कि वह अपने संतानों को इस अनुरूप संस्कारित कर पाता और संतान यह समझने में समर्थ हो पाते कि पिता का सम्मान पुत्र का परम दायित्व होता है।





                                                             (2)

काशीनाथ को विरासत में पिता से अकूत संपत्ति मिली थी। सब कुछ बना-बनाया कारोबार था, सो आधी जिंदगी तो बिना कुछ किये धरे ही निकल गयी।लेकिन विरासत की चादर काशीनाथ के दुर्बल पुरूषार्थ और अकर्मण्यता को बहुत दिनों तक ढककर ना रख सकी।अंग-प्रत्यंग उघड़ते ही संतानों के समक्ष पिता की कमजोरी उजागर होने लगी और संतानों के मन में स्वाभाविक रूप से असंतोष की ज्वाला धधकने लगी।वैसे सच तो यह था कि दिन-रात तास-चौपड खेलते हुये जमींदार साहब को यह भान भी ना रहा कि बच्चे कब बड़े हो गये।ना उम्र भर कभी बच्चों की आवश्यकताओं का रत्ती भर ख्याल रहा और ना ही पत्नी सुनयना की भावनाओं को समझने की आवश्यकता ही।धीरे-धीरे जब संपत्ति पैरों तले खिसकने लगी तो कुछ आभास हुआ भी लेकिन फिर भी इसी मुगालते में दिन मजे से गुजारते रहे कि नदी से चो-चार लोटा पानी निकल भी जाये तो आखिर कितना फर्क पड़ जायेगा? वे दिन-रात चौपाल पर ही बैठे रहते, वो तो लुगाई की जचकी के कारण लोक-लाज के डर से कुछ चिंता उनके चेहरे पर आज दिख रही थी वरना छोटी-मोटी बीमारी तो सुनयना खांसते-खखारते ठीक कर लेती।



सुनयना इन सबसे काफी रूष्ट रहती, वह स्वयं काशीनाथ के प्रति अपने भीतर की सुलगती आग को किसी तरह ठण्डा करने दिन-रात खुद को रसोई के काम में व्यस्त रखा करती। समय बच जाता तो इस जनम को धन्य-धान्य बनाने साधु-महात्माओं के प्रवचन सुन आती या फिर मंदिरों में भजन-पूजन करने चली जाया करती।लेकिन बच्चे तो बस किसी तरह घुटते-पिसते बड़े हो गये।कुल मिलाकर एक तरह से बच्चे, माता-पिता के होते हुये भी संस्कारों के मामले में अनाथ ही थे। वे उसी तरह बड़े होते गये, जैसे उसर जमीन पर किसी ने ज्वार का छींटा फेंक दिया हो।



बड़े बेटे के विद्रोही रूख को देखते हुये जमींदार काशीनाथ को चिंता सताने लगी थी, कि कहीं यह भी बड़ी बेटी की तरह हाथ से ना निकल जाये।चार साल पहले बड़ी बेटी कुसुम, पड़ोस के गांव के किसी विजातीय लड़के के साथ भाग गयी थी।गांव भर खूब थू-थू हुई थी।वो तो बीते मालगुजारी शासन का दबदबा अभी भी बरकरार है, लोगों के मन में लाज-भय बाकी है तो किसी ने कुछ नहीं कहा, वरना आजकल मुंह पर बोलने में देर कहां? लोग कहते बखत ये थोड़े ही सोंचते हैं कि माटी का चुल्हा घर-घर है।काशीनाथ के मन में जैसे ये सारी बातें एक वृत्तचित्र की भांति पुनरावृत्त हो रही थीं।



छोटा भाई सुखनाथ बड़ी देर से पिता-पुत्र के बीच के विवाद को सुन रहा था, पर बड़े भाई के समक्ष कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। थोड़ी देर में अकेला देख वह गोपू के पास पहुंच गया।अब तक चैसरिये भी जा चुके थे।



क्या हुआ गोपू? ऐसे नाराज नहीं होते बेटे, तुम तो पढ़े-लिखे समझदार हो। शहर में ग्रेजुयेट कर रहे हो, वो और कुछ नहीं तो तुम्हारे पिता हैं। छोटे भाई सुखनाथ ने गोपू को पुचकारते हुये कहा।



अरे, देखो ना काकू! बाबूजी थेाड़ी-थोड़ी बात पर बेवजह चिल्लाने लगते हैं। इसीलिये तो मैं गांव नहीं आता। मां ने कितनी बार कहा होगा तब कहीं तीन सालों में तो आ रहा हूं, आप तो जानते हैं।







ठीक है, पर ऐसे नहीं बोलते।भैया की पूरे गांव में तूती बोलती है, हम कदर नहीं करेंगे तो ये रैयत भला क्यों करने चले? काका सुखनाथ ने समझाते हुये कहा।



काका, जमाना कहां पहुंच गया...।एक दिन कह दिया कि कुछ खेत बेचकर शहर में एक होटल खोल लेते हैं, दिन-दूनी रात चैगुनी तरक्की होगी।...बिना सोंचे-समझे भड़क गये, कहने लगे- मैं जीते जी एक इंच जमीन नहीं बेचूंगा।हूं... ऐसे कलेजे से लगाकर रखे हैं जैसे सब अपने साथ ही ले जायेंगे।



ठीक ही तो कहते हैं गोपू, अब इस पर नाराजगी तो ठीक नहीं।हम सब पुरखों के जमीन के पहरेदार तो हैं।उसी की पहरेदारी करते हुये बस फसल खाते रहें, कई पीढ़ीयों तक चलेगंी। क्या बुरा है, उनका कहना...? सुखनाथ ने बड़े भाई का पक्ष लेते हुये कहा।



और खुद ऐश कर रहे हैं तो?



देखो गोपू, ऐसा नहीं कहते।



आप तो उनके भाई लक्ष्मण हैं, मुंह ही नहीं खोल सकते। काकू! कह दूंगा, तो अच्छा नहीं लगेगा, सोंचों जरा! ये कोई उमर है? जिसको पता चलेगा हंसेगा, थंूकेगा हम पर। सोंचा है... मुझे कितनी शर्म आयेगी, यार-दोस्तों के बीच ये सब बताने में। अरे! तीन क्या कम हैं? लगता है बाबूजी क्रिकेट टीम तैयार करेंगे।



देखो गोपू, अब तुम कुछ ज्यादा कह रहे हो?



क्या ज्यादा काकू...! ये सब दकियानुसी देहातीपन है। गांव-देहात में कुछ काम-धाम तो नहीं।बस...।



गोपू के विद्रोही रूख को देखते हुये सुखनाथ ने कुछ ज्यादा ना कहना ही बेहतर समझा और बडे़ भाई काशीनाथ के पास आकर बैठ गये।

                                                             (3)

काशीनाथ सुनयना को मन ही मन बार-बार कोसते एकांत में चिंतित मुद्रा में बैठे हुये थेे।विचार कर रहे थे, चलो उसके पास तो दस तरह का लफंदर काम है, पंच-पंचायती के लफड़े से लेकर लगान-जुर्माने तक का, पर सुनयना को तो ये सब देखना चाहिये।कितनी बार कहा होगा, बच्चों को ज्यादा लाड़-प्यार मत दो।पांच साल तक लाड़ो फिर चैदह तक ताड़ो, पर सुनयना ये सब समझे तब ना।मन ही मन विचार कर रहे थे, वाकई बच्चों को बिगाड़ने में मां का ही ज्यादा हाथ होता है।



सुखनाथ, क्या उपाय है दाउ ? लड़का हाथ से निकला जा रहा है।शहर जाने के बाद कुछ ज्यादा ही... काशीनाथ ने चिंतित मुद्रा में समीप बैठे छोटे भाई सुखनाथ के समक्ष अपनी व्यथा रखते हुये कहा।



नहीं भैया, ऐसा नहीं है। जवानी में गरम-गरम खून होता है।सबको गर्मी रहती है, हम सब भी तो ऐसे ही थे।शादी-ब्याह के बाद जिम्मेदारी आने पर सब ठीक हो जाता है। भैया! मेरी मानो, गोपू का ब्याह कर दो।



पर अभी से...? अभी तो पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई।जमींदार काशीनाथ ने कहा।



भैया, पढ़ाई-लिखाई तो बाद में भी होता रहेगा।और फिर अब छोटा थोड़े ही है, इस उमर में तो हमारे बच्चे हो गये थे।





हां, ठीक ही कहते हो, दीनानाथजी तो कब से कमर में गांठ बांध के पीछे पड़े हुये हैं, मैं ही ध्यान नहीं दे रहा...।



काशीनाथ जी के घर पर बेटी हुई। बाजे-गाजे बजे, पटाखे छोड़े गये, खूब धूम-धड़ाका हुआ। पर मजाल है गोपू पल भर भी बैठकर मेहमानों की जरा सी आवभगत कर ले। जिसे आना है, आये, जिसे जाना है जाये।गोपू को ना इसमें कोई दिलचस्पी थी और ना ही वह इस खुशी में शरीक होना चाहता था।वह तो अलमस्त चुपचाप कुण्डली मारे एक जगह पड़ा रहता।एकांत में बैठे यही विचार करता कि कहां आकर फंस गये, वो तो मां ने अपनी बीमारी का बहाना ना बनाया होता तो वह इस गर्मी में भी घर ना आता।



बात सुनयना तक पहुंची, किसी ने यह भी कह दिया कि बड़े मालिक से दो-चार बात भी हो गयी है। जचकी के उपरांत सुनयना से रहा ना गया।उसने गोपू को पास बुलाया, बिठाकर ठिठोली करते लाड से कहने लगी- क्या बात है बेटा, इस बार उखड़ा-उखड़ा सा है? मन ठीक तो है ना? यार-दोस्तों के बीच कुछ कहा-सुनी तो नहीं हो गयी?



नहीं मां, ऐसा कुछ नहीं है। गोपू ने शंात मन से कहा।



तो फिर, चुप-चुप क्यों है?किसी मुंहचिढ़ी के पल्ले तो नहीं पड़ गया?ठिठोली करते हुये कहने लगी।



क्या मतलब?



खैर छोड़, ये बता तूने दीनानाथ जी की बेटी को देखा?कितनी सुंदर है, सयानी और कितनी समझदार।सुनयना जैसे बातों ही बातों में विवाह की पृष्ठभूमि तैयार करने का प्रयत्न कर रही थी।



देखा ना मां!



कैसी लगेगी हमारे घर बहू की बनेगी तो? सुनयना ने कौतुहल से कहा।



मेरे लिये? मुझे ब्याह-व्याह नहीं करना।गोपू ने मंुह ऐंठते हुये कहा।



तो क्या साधु-सन्यासी बनेगा? गोरखपुरिया बाबा बन जायेगा क्या? सुनयना हंसते हुये कहने लगी।



तो क्या जो लोग शादी नहीं करते, वे सब बाबा बन जाते हैं।मुझे नहीं करनी शादी ब्याह।और करोगे तो ठीक नहीं हेागा...।



बेटा शादी ब्याह से जिंदगी में ठहराव आता है, वरना जिंदगी तो बस नदी-नाले की तरह है और फिर कहते हैं शादी-ब्याह से किस्मत भी तो बदलती है।सुनयना ने प्यार से गोपू के हाथ को वात्सल्य भरा स्पर्श देते हुये कहा।







हां मां, तूने ये ठीक कही।बड़ी बुआ के लड़के को तो हमने देख ही लिया ना! शादी करते ही धांय से किस्मत बदल गयी, राजा से रंक और भिखारी। अब तो ना खाते बन रहा ना उगलते।तलाक भी नहीं हो रहा, दोनो मन मसोसकर अलग-अलग रह रहे हैं। और वो छोटी मामी के भाई..? क्या हाल है? पूरे सात फेरे लिये थे, देख लिया ना हाल..., वह जैसे तिलमिला सा गया। फिर कहने लगा- ये सब शादी-ब्याह बकवास हैं, और फिर दूर जाने की क्या जरूरत है मां... खुद का ही देख लो ना...।कितना सुख मिला है, शादी करके? बताओ? बताओ ना...?



इस बार सुनयना चुप हो गयी, अतीत की कड़वी स्मृतियांे पर किसी तरह नियंत्रण पाते हुये वह क्रोध से गोपू पर चिल्ला पड़ी- देखो गोपू, बहुत हो गया।उन्होने चाहे जो किया, लेकिन अपने बाबूजी के खिलाफ एक शब्द भी कहा, तो ठीक नहीं होगा।


                                                        (4)
रात घर पर बड़े-बूढ़ों की बैठक हुई, काका-काकी, सुनयना और जमींदार काशीनाथ। गोपू का बढ़ता हुआ विद्रोह उन सबके लिये चिंता का विषय था।सबने तरह-तरह से अपने विचार रखे। लेकिन अंत में इस बात पर सभी एकमत थे कि किसी भी तरह, चाहे अनिच्छा के साथ ही क्यों ना हो, गोपू की ब्याह कर दी जावे। उन्हे भरोसा था कि विवाह के पश्चात उसकी निरंकुशता और उद्दण्डता दोनों पर ही लगाम लगाने में मदद मिलेगी।वे सभी भी समाज के अन्य लोगों की तरह लड़की को संस्कारों की पाठशाला और रईस बाप के बिगड़ैल औलादों के रिपेयर करने की गेरेज के रूप में देखा करते।



गोपू ने खूब विरोध किया लेकिन कभी पुरखों की कसमें तो कभी लोकलाज का भय दिखा, जबरदस्ती आनन-फानन में कुछेक रिश्तेदारों की मौजूदगी में दीनानाथ जी की लड़की से विवाह करने का निर्णय ले लिया गया।



घर में बड़ा भारी उत्सव रखा गया, मण्डपाच्छादन, हरिद्रालेपन। तेल-हल्दी की रस्में हुईं, घर पर भोज का कार्यक्रम रखा गया।एक-दो करते-करते ढेर सारे मेहमान को निमंत्रित कर लिया गया। कुछ तो बिन बुलाये भी पहंुच गये, कहने लगे- भैया, हम सोंचे कि जल्दी-जल्दी में हमारा नाम छूट गया होगा, नहीं तो ऐसा कभी नहीं हो सकता कि बड़े मालिक के घर पर शादी-ब्याह का कुछ कार्यक्रम हो और हमें छोड़ दें।सात पीढ़ी पहले का संबंध है, कभी तोड़े नहीं टूट सकता।



घर पर लक्ष्मी विराजमान हो तो मेहमानों और रिश्तेदारों को ना पूछ-परख की जरूरत पड़ती और ना जरा-जरा सी बात पर उनका अभिमान- स्वाभिमान आहत ही होता।वो तो दरिद्री ही सब बीमारियों की जड़ है, हर पल मेहमानों का ऐसे ध्यान रखना पड़ता है जैसे घर पर देवता पधारे हो, पता नहीं किस क्षण किसकी आत्मा दुखी हो जाये और घर से कन्नी काट ले।





गोपू के शरीर पर जैसे धर-बांधकर हल्दी चढ़ाई गयी, रस्में अदा की जाने लगीं।घर पर विवाह गीत गूंजने लगे। बड़ी बेटी जो पास के गांव के किसी लड़के के साथ चार साल पहले भागी थी, लाउडस्पीकर पर दूर से विवाह गीतांे को सुना करती तो व्यथित हो जाती।जवानी का खुमार अब ठण्डा पड़ गया था, दुखी हो सोंचा करती काश!आज वो यदि वहां होती तो घर पर उसकी चलवा-चलती होती। पूरे घर में अगवाई कर रही होती। उसके पूछे बिना पत्ती तक नहीं हिलता।कुंवारी थी तो बात-बात में उसकी मां उससे पूछा करती। सोने के कंगन कहां रखे हैं और वो पाजेब, करधनी कहां हैं? वो हल्दी और मिर्ची का डिब्बा और वो गुलाब जामुन का कनस्तर? जाओ दस-बीस निकाल चैपाल पर पहंुचा दो...। वो तो मां-बाबूजी के रात-दिन के कलह का ही दुख था, थोड़ी-थोड़ी बात पर बेवजह लड़ा करते। फिर बाबूजी ने कभी एक नजर देख तो लिया होता, कि बेटी बड़ी हो रही है, उसे भी बाबूजी का गोद चाहिये, एक हल्का प्यार भरा स्पर्श चाहिये।उसके अंदर की फूटती जवानी के ज्वार को शांत करने उनका वात्सल्य चाहिये...।फिर वो काहे गैरों के प्यार की तलाश में भटक अपना जीवन बर्बाद करती।कहां-किसके झांसे में आकर फंस गयी...।काश! घड़ी का कांटा एक बार फिर घुमकर वहीं आ जाता, फिर दोबारा वह ऐसी गलती कभी नहीं करती। ससुराल अच्छा हो तो मां-बाप की याद भले ना आये, लेकिन यदि वहां दुख मिले तो मायके की याद मरते दम तक शूल बनकर चुभती है।



इधर गोपू उसी उधेड़बुन में पल-पल बड़ी मुश्किल से गुजार रहा था कि कब मौका मिले और वह वहां से भाग निकलेे? बारात जाने के ठीक एक दिन पहले आधी रात गोपू घर छोड़कर भाग निकला। सुबह घर में सबको जब खबर लगी तो अफरा-तफरी मच गयी।लाख दबाने के बाद भी अड़ोस-पड़ेास और गांव तक खबर फैल गयी।रिश्ते-नातेदारों में खलबली सी हो गयी।



जो रिश्ते-नातेदार विवाह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आये थे, वे आपस में खुसुर-पुसुर करते आपस में बतियाने लगे। एक ममेरे भाई ने किसी के कान में कहा- बहुत डींग मारते थे, अब लड़के बड़े होकर फल दे रहे, तो दूसरे ने कहा- अति सर्वत्र वर्जयेत काका। भैया, बहुत अति किये हैं अपनी जवानी में। करनी दिखे, मरनी के समय। अब सब दिख रहा। पास खड़े एक ने कहा- अभी तो शुरूवात है फूफाजी, आगे...आगे देखिये होता है क्या? अभी तो सब फल बाकी है। दूसरे छोर पर एक कमरे में छोटी बहन बड़ी से कहने लगी-इसीलिये कहते हैं दीदी, किसी को हंसना नहीं चाहिये।भगवान सबको बारी-बारी फल देता है।भैया सबको हंसते थे, वो नीच कुल का है...उसके यहां पानी नहीं पीयूंगा, उनके घर नहीं जाउंगा... अब उनके घर पर ही सब दिख रहा। एक दूर की रिश्तेदार कहने लगी- सब जमींदारनई निकल गयी, गांव भर सब थू-थू कर रहे।



गोपू की जगह-जगह पतासाजी की गयी, कहीं नहीं मिला।जमींदार के नाक कटने की नौबत आ गयी।वह चिंतित मुद्रा में चैपाल पर तखत में लेटे हुये थे। सुनयना कहने लगी- क्यों, अब क्या करेंगे? समधीजी को क्या बतायेंगे? लड़की की हल्दी दूजे जो नहीं चढ़ती...।



जमींदार ने गंभीर मुद्रा में कहा- शादी तो होगी, चाहे पृथ्वी इधर की उधर हो जाये, काशीनाथ अपनी जुबान से नहीं फिरता।







कैसे होगी? चिंतित सुनयना पगड़ी उछलने के डर से सहमी हुई थी।



तुम अभी जाओ, मैं देखता हूं। काशीनाथ के आवाज में तल्खी थी।



काशीनाथ बड़े पशोपेश में पड़ गये, इसी चिंता में उन्होने परिवार के पुरोहित से विचार विमर्श किया। पुरोहित ने सलाह दी कि लड़के के बीमार होने, कहीं अन्यत्र चले जाने और अन्य किन्ही कारणों से विवाह में उपस्थित ना हो सकने पर सांकेतिक रूप में पीढ़े के साथ भी कन्या का, अग्नि केा साक्षी मान शास्त्रों में फेरे लेने का विधान है।



पुरोहित की बात मान ली गयी।घर में छोटे भाई सुखनाथ और सुनयना का भी यही मत था कि गोपू कहीं और भागकर नहीं जायेगा, बच्चा है आ जायेगा और आते ही कन्या उसे सौंप दी जायेगी। लड़की के पिता दीनानाथ जी को इन सबके बारे में बता दिया गया। एक दिन बाद बारात लड़की वालों के घर प्रस्थान करनी थी। लड़की को जब इन सबके बारे में पता चला तो उसने मां से मना करते हुये कहा- मां यदि रस्मों रिवाजों में दूजे हल्दी चढ़ने की प्रथा ना हो तो वह विधवा रहना पसंद करेगी पर इस तरह बेमन से किसी के गले का फंदा नहीं बनना चाहती।वो ब्याह नहीं करेगी।



लड़की की मां ने समझाते हुये कहा-बेटा,ऐसा रिश्ता सात पुश्तों में किसी को कभी नहीं मिला। तेरी बुआ को तो देखा ना...,



पर मां... वो... मैं.. मैं ब्याह नहीं करूंगी, उसने रूंआसे स्वर में कहा।



लड़की की मां को लगा कि वह सचमुच मना ना कर दे, उसने लाड से समझाते हुये कहा- बेटा, लड़की गाय की तरह होती है, पिता जिसके खूंटे से बांध दे ना-नुकुर नहीं करते, नहीं तो समाज में हंसने वाले पचास ठहरे।



शादी हुई, लड़की बहू बनकर घर आ गयी। काशीनाथ के मन में गोपू के प्रति अपार क्रोध था लेकिन वह कर भी क्या सकता था।इधर उसकी नवब्याहता बहू असंतुष्ट सी घर के एक कोने में पड़े रहती।घर के काम में हाथ बंटाने की बजाय उसने अपने कमरे को ही कोपभवन बना लिया था। उसके सारे उमंग-उत्साह समाप्त से हो गये थे।वह घर पर कंुवारी बहू के रूप में रह रही थी।लड़की ने एक साल प्रतीक्षा की और अंत में मायके जाकर बैठ गयी।



इधर पूरे गांव में जमींदार के घर की ही चर्चा होती।सब खुसुर-पुसुर करते आपस में कहते- वो कैसे रह रही होगी,क्या कर रही होगी, खाती होगी भी या नहीं? कोई कहता, वाकई बड़े मालिक तो कसाई हैं, बेचारी को खूंटे से बांधकर रखा है।जितनी मंुह उतनी बातें, किसी के मुंह से कुछ तो किसी से कुछं। एक हितैषी वृद्ध ने कहा-अरे बाबू। भगवान मुंह दिया है तो मालिक के घर की बुराई को नहीं दिया, भगवान भजन करो, पुन-प्रताप मिलेगा।किसी ने चुगली करते हुये कहा- अरे भैया, जितनई बड़े आदमीन, उतनई भीतर बड़ पोल। हमार घर दुआर में अईसन होत तो इहि कहे देतिन कि इन गंवारन का कोई जात घर्म नाहिं। अकल-फकल तो हैं नहीं इन भसरभोंग का।घर गृहस्थी चलाये भी नहीं जानेत।



                                                                    (5)



छोटे भाई सुखनाथ को जब लगने लगा कि भैया काशीनाथ के पैरों तले आधार खिसकने लगा है। गाहे-बगाहे उसके थू-थू में वह भी कहीं ना कहीं भागीदार बन रहा है।उसके मान-सम्मान का लाभ उसे कम बल्कि उसकी बदनामी में बेवजह कहीं ज्यादा हिस्सेदार बनना पड़ रहा है, तो उसने कन्नी काटने का मन बना लिया।आज तक भाई के समक्ष कभी जुबान नहीं खोली थी, सो हिम्मत नहीं हुई।लेकिन भाभी सुनयना के सामने यह कहने में देर नहीं की कि भाभी, मीठे-मीठे ही भाईयों के बीच बंटवारा हो जाये तो ज्यादा अच्छा होता है,नहीं तो बांटे भाई पड़ेासी होने से भला क्या लाभा? क्यों ना भईया से कहते...।



जब जमींदार काशीनाथ को छोटे भाई के इरादों के बारे में पता चला तो वे बड़े रूष्ट हुये। उन्हे गहरा सदमा लगा। गोपू के विद्रोह ने उसे उतना झटका नहीं दिया था जितना भाई के अलग होने के इरादे ने। उसने आव देखा ना ताव और जमीन का आधा हिस्सा भाई को देकर उसी दिन रसोई अलग कर दिया।धन जाने पर शक्ति का ह्वास होता देख जमींदार अकुला उठा। गांव में नंबर वन का जमींदार बंटवारा होते ही तीसरे और चैंथे पायदान पर आ गया।रही-सही कसर बेटे गोपू ने पूरी कर दी।वह भी एक दिन घर आ पिता से बंटवारा लेने की जिद्द पर अड़ गया और अपने हिस्से की पचास बीघा जमीन बेचकर शहर चला गया।



धीरे-धीरे अब पंचायत के निर्णयों में जमींदार काशीनाथ के उपस्थिति की अनिवार्यता घटने लगी। चौपाल पर चाय डकारते धुनी जमाकर चौसर खेलने वाले चैसरिये अब काशीनाथ के चौपाल पर जाने कन्नी काटने लगे।पड़ोस के दरोगा और हाकिम गांव से होकर चले जाते लेकिन काशीनाथ को खबर भी ना लगती। एक तरह से काशीनाथ का गांव पर से नेतृत्व खिसकने लगा।घर से आदमी का मान बढ़ता है, घर से घटता है। जब गांव के लोगों ने देखा कि काशीनाथ के नेतृत्व का अनुसरण करने वाले स्वयं उसके घर में कोई नहीं है,तब उसका मान-सम्मान स्वतः ही घटने लगा।गांव में इस नेतृत्व के निर्वात को पूरा करने एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गयी। पूरा गांव कई खेमों में बंट गया। उसकी एक आवाज पर जहां सैकड़ो लोग इकट्ठा हो जाते वहां वह खिसियाता हुआ दिन भर चिल्लाता रहता पर कुत्ता भी भौंकने नहीं आता। जो लोग बेवजह उसकी गलियों में मेल-मुलाकात के लिये पंक्तिबद्ध खड़े होते वे उस गली में जाने से मुंह बिचकाने लगे कि कहीं काशीनाथ से भेंट मुलाकात हो गयी तो बेवजह का ”पाय लागू “ ना करना पड़ जाये।काशीनाथ अपनी इस स्थिति पर बड़ा दुखी रहने लगा। काशीनाथ को अपनी उपेक्षा खलने लगी, इधर घर में अपनों के बीच परायों सी दूरियंा, दरख्ते रिश्ते और गांव में पूछ-परख की कमीं उसे लगातार खटकने लगी और यही हाय उसे भीतर तक खोखला करने लगी।



जीवन भर नेतृत्व थामे हाथों में जब रिक्तता का आभास होता है तो उसे गहरी पीड़ा होती है। अपना दुख दीवारों के भीतर बांटने के अलावा उसके सामने कोई विकल्प नहीं होता। जीवन भर सहज और सामान्य लोगों को दो टके का व्यक्ति समझ दूरियां स्थापित करने वाला वह दीवारों के बीच घुटता हुआ मौत को प्रतीक्षित एक अभिशप्त इंसान बन जाता है।



जमींदार काशीनाथ इस अभिशप्त जीवन को किसी तरह घिसटकर जीता हुआ स्वयं को कमरे की दीवारों के बीच समेट लिया। वह अपनी और अधिक उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकता था। गांव,बस्ती,भाई, पुत्र-पत्नी और अन्य नातों के बीच दरख्ते रिश्तों को महसूस करने और उनका विश्लेषण करने आज उसके पास भरपूर वक्त था।वह महसूस कर रहा था कि कहीं ना कहीं उससे भारी चूक हो गयी। वह बचपन में पिता के साथ कभी खेतों में फसलों को लहलहाता हुआ देखा करता। उसे आज भान हो चुका था कि संतान भी किसान के द्वारा खेतों में रोपे गये बीज की तरह होते हैं। उसे भी फसलों की तरह समय-समय पर संस्काररूपी पोषण की आवश्यकता होती है । जिस तरह फसलों को खरपतवार से बचाने कई बार निंदाई-गुड़ाई की जाती है, ठीक उसी तरह संतान की वृद्धि के साथ दुर्गुण भी खरपतवार की तरह पनपते हैं। जो इंसान एक समझदार पिता के रूप में इन खरपतवारों की गुड़ाई कर उसे हटाने में समय रहते समर्थ हो जाते हैं वे एक सफल पिता कहलाते हंै और जिनके पास संतानों के इन दुर्गंणों की गुड़ाई के लिये वक्त नहीं होता वे भले ही आकाश पर महिमामंडित होते रहें पर अंततः वे संतान ही उसके पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जमींदार को आज इस बात का ज्ञान हो चुका था कि तास-चौपड की मियाद पर बच्चों में संस्कारों की नींव नहीं डाली जा सकती।

3 टिप्पणियाँ:

Indian Home Maker ने कहा…

Bahut achchi kahani hai.

केवल राम ने कहा…

क्या कहानी कही है ....आगे बढ़ें शुभकामनायें
चलते -चलते पर आपका स्वागत है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अच्छी लगी कहानी ..संस्कार ऐसे ही नहीं आते ..