शुक्रवार, 19 नवम्बर 2010

दरख्ते रिश्ते

दुग्ध धवल सा रात्रि का प्रथम प्रहर चंद्रमा की चंचल किरणों से अठखेलियां कर रहा था।रोज की तरह आज भी जमींदार के  चौपाल पर चौसर की बिसात बिछी हुई थी, पर जमींदार का मन चौसर के खेल में लग नहीं रहा था।कभी वह खिसियाया हुआ मन ही मन भुनभुनाता अंदर जाता, तो कभी चिंता की लकीरों को अपने चमकते भाल पर समेटता हुआ चैपाल पर आकर बैठ जाता। वह न तो घर पर आये चौसरिये  मेहमान को अपनी चिंता से अवगत कराने का साहस जुटा पा रहा था और न ही बीस बरस साथ बिता लेने के पश्चात लुगाई को उसके हाल पर छोड़ देने की हिम्मत।मन अधीर था तो शरीर की बेचैनी से कांपता बदन युवावस्था के निर्गमन का जैसे संकेत सा दे रहा था।इसी उहापोह में वह थोड़ी दूर खड़े अपने बड़े बेटे गोपू को बुलाकर कहा -



अरे गोपूू जरा इधर तो आ।



हां बाबूजी, बोलो।गोपू ने पास आकर कहा ।



अरे जरा जाकर घर के अंदर तो देख, देख तेरी मां की हालत अब कैसी है? जब से शहर से आया, कौड़ी भर का काम नहीं। दिन रात इधर-उधर की लट्ठमारी से तुझे फुर्सत ही नहीं मिलती।कहां गया था सुबह से? अरे! अब बड़ा हो गया है, घर की जिम्मेदारी सम्हाल। तेरी उमर में मैने पूरे गांव की पटेलगिरी सम्हाल ली थी। जमींदार ने एक कोने में ले जाकर अपने बड़े बेटे गोपू से अंाख लाल करते हुये कहा।



बाबूजी! आप भी गजब करते हैं, छोटी-छोटी बात पर बेवजह चिल्लाने लगते हैं। अरे आज सुबह से मै पान के ठेले तक भी नहीं गया हूं और आप हैं कि...।



जमींदार ने दबी जुबान से गोपू को डांट लगाते हुये कहा-हंा-हां बस कर बहुत जुबान चलाता है, तुझे तो कुछ बोलना ही पाप है।थोड़ा सा बोल क्या दो, मुंह तो बस कैंची की तरह चलती है। ये सब तेरी मां का करा धरा है वरना...।



वरना क्या? आज तक इन तास चौपड के अलावा कभी फुर्सत मिली है आपको! चार लोगों को बिठा लिया और गप्पें मारने के अलावा कुछ और काम तो है नहीं आपके पास। गोपू ने आंख-भौं सिकोड़ते हुये कहा।



तू बस भी करता है या फिर ...। अरे जरा तेरी मां को तेा देखकर आ जा...।



अरे, कह तो रहा ना! थोड़ी देर पहले मैं वहीं था।अब आपको कैसे समझांउ? काकी कमरे के अंदर मां के पास बैठी है, कमरे में किसी को जाने से मना किया है। अब आप ही बताओ, ऐसे में क्या मै दरवाजे पर बैठकर ढोल नंगाड़े बजाउं। गोपू ने लंबी खीझ भरते हुये कहा।



हां बस-बस, ठीक है। यहीं रहना, बस इतना ही कह रहा हूं।







जमींदार काशीनाथ के अंदर का गरम खून जैसे मानो उबल पड़ा था। वह सोंच रहा था यदि इसी तरह की जुबान गांव के किसी आम आदमी ने चलाई होती तो उसकी चमड़ी उधेड़ कर रख देता।साले की जुबान खींच देता, ऐसा मारता कि उसकी सात पीढ़ीयां घर के दरवाजे पर आने के पहले सौ बार सोंचती।पर जवान बेटा कुछ बोलने पर उल्टा सीधा कर बैठा तो जिंदगी भर किस्मत पर रोने के अलावा कुछ नहीं रहेगा।अपनों का मारा कहां मुंह दिखाये, कुछ ऐसी ही हालत जमींदार काशीनाथ की थी। आदमी की किस्मत में शायद यही होता है, जो लाखों दिलों पर राज करता है, वह घर की उपेक्षा का शिकार होता है।जो सैकड़ों पर हुकुम चलाता है, उसी के नाक तले उसके आदेशों की अवहेलना होती है।जिनकी खुशी के लिये वह दूसरों को सताता है वही उसकी खुशियों को अंत में तार-तार कर देता है।



जमींदार के पैर की जूती गोपू के पैर के बराबर हो चुकी थी।काशीनाथ इस बात को समझता था कि जवान होते बेटे से टकराना बुद्धिमानी की बात नहीं।शायद इसी कारण वह कुछ खिसियाया सा चुप हो गया।जमींदार और गोपू के संबंध लगभग वैसे ही थे जैसा पुराने जमाने में राजा और विद्रोही युवराज के बीच हुआ करते थे। गोपू को यह बात नागवार गुजरती कि उसकी पिता की छत्रछाया उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में बाधक है जो उसकी कद काठी को न केवल कम करता है बल्कि उसकी महत्वाकांक्षाओं का यदा-कदा दमन भी करते रहता है ।



जमींदार मन ही मन बुदबुदाते हुये अतीत की उन स्मृतियों में खो गया, जब एक पिता के सामने अदब और तहजीब से पेश होना पुत्र एवं परिवार के संस्कारिक होने का प्रमाण माना जाता था।वह अपने युवाकाल की उन यादों का स्मरण करने लगा जब वह खुद पिता के सामने चालीस बरस की उमर तक सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था।मां के लाख कहने पर कभी एक साथ भोजन परोसा जाता तो जैसे एक निवाले गटकने में गिलास भर पानी कम पड़ जाता जाता। गोपू की मां तो जैसे कभी पिता के अंतिम सांस तक खाट के नजदीक आने की हिम्मत ही नहीं जुटा पायी। वह सोंच रहा था, एक वह काल था जब पिता के साथ बड़े सम्मान एवं सलीके से पेदा हुआ जाता था और आज लड़कोें को पिता ही नहीं बड़ों के साथ बात करने की तहजीब नहीं।



काशीनाथ इन बदली हुई परिस्थितियों के लिये तेजी से हो रहे सामाजिक परिवर्तन को कसूरवार ठहराते हुये चैपाल पर बैठ प्रायः कहा करता- ये रैयत के लौंडन, दिल्ली, मुम्बई कमाये-खाये जा गांव बिगाड़ दियैन। बड़े-छोटन के सब लिहाज भुलाई दिहीन।



दरअसल पिता-पुत्र के बीच की वैचारिक समझ की शून्यता तथा उनके बीच सामंजस्य और विचारों के साझेदारी का अभाव किशोर मन पर विद्रोह की अनगिनत लकीरें खींचता है, जिसका खामियाजा हर पिता अपने पुत्र की उपेक्षा के रूप में वृद्धावस्था में भुगतता है परंतु कदाचित जमींदार इन सबसे ना केवल बेखबर था अपितु चैसर के खेल से उसे इतनी फुर्सत ही ना मिली कि वह अपने संतानों को इस अनुरूप संस्कारित कर पाता और संतान यह समझने में समर्थ हो पाते कि पिता का सम्मान पुत्र का परम दायित्व होता है।





                                                             (2)

काशीनाथ को विरासत में पिता से अकूत संपत्ति मिली थी। सब कुछ बना-बनाया कारोबार था, सो आधी जिंदगी तो बिना कुछ किये धरे ही निकल गयी।लेकिन विरासत की चादर काशीनाथ के दुर्बल पुरूषार्थ और अकर्मण्यता को बहुत दिनों तक ढककर ना रख सकी।अंग-प्रत्यंग उघड़ते ही संतानों के समक्ष पिता की कमजोरी उजागर होने लगी और संतानों के मन में स्वाभाविक रूप से असंतोष की ज्वाला धधकने लगी।वैसे सच तो यह था कि दिन-रात तास-चौपड खेलते हुये जमींदार साहब को यह भान भी ना रहा कि बच्चे कब बड़े हो गये।ना उम्र भर कभी बच्चों की आवश्यकताओं का रत्ती भर ख्याल रहा और ना ही पत्नी सुनयना की भावनाओं को समझने की आवश्यकता ही।धीरे-धीरे जब संपत्ति पैरों तले खिसकने लगी तो कुछ आभास हुआ भी लेकिन फिर भी इसी मुगालते में दिन मजे से गुजारते रहे कि नदी से चो-चार लोटा पानी निकल भी जाये तो आखिर कितना फर्क पड़ जायेगा? वे दिन-रात चौपाल पर ही बैठे रहते, वो तो लुगाई की जचकी के कारण लोक-लाज के डर से कुछ चिंता उनके चेहरे पर आज दिख रही थी वरना छोटी-मोटी बीमारी तो सुनयना खांसते-खखारते ठीक कर लेती।



सुनयना इन सबसे काफी रूष्ट रहती, वह स्वयं काशीनाथ के प्रति अपने भीतर की सुलगती आग को किसी तरह ठण्डा करने दिन-रात खुद को रसोई के काम में व्यस्त रखा करती। समय बच जाता तो इस जनम को धन्य-धान्य बनाने साधु-महात्माओं के प्रवचन सुन आती या फिर मंदिरों में भजन-पूजन करने चली जाया करती।लेकिन बच्चे तो बस किसी तरह घुटते-पिसते बड़े हो गये।कुल मिलाकर एक तरह से बच्चे, माता-पिता के होते हुये भी संस्कारों के मामले में अनाथ ही थे। वे उसी तरह बड़े होते गये, जैसे उसर जमीन पर किसी ने ज्वार का छींटा फेंक दिया हो।



बड़े बेटे के विद्रोही रूख को देखते हुये जमींदार काशीनाथ को चिंता सताने लगी थी, कि कहीं यह भी बड़ी बेटी की तरह हाथ से ना निकल जाये।चार साल पहले बड़ी बेटी कुसुम, पड़ोस के गांव के किसी विजातीय लड़के के साथ भाग गयी थी।गांव भर खूब थू-थू हुई थी।वो तो बीते मालगुजारी शासन का दबदबा अभी भी बरकरार है, लोगों के मन में लाज-भय बाकी है तो किसी ने कुछ नहीं कहा, वरना आजकल मुंह पर बोलने में देर कहां? लोग कहते बखत ये थोड़े ही सोंचते हैं कि माटी का चुल्हा घर-घर है।काशीनाथ के मन में जैसे ये सारी बातें एक वृत्तचित्र की भांति पुनरावृत्त हो रही थीं।



छोटा भाई सुखनाथ बड़ी देर से पिता-पुत्र के बीच के विवाद को सुन रहा था, पर बड़े भाई के समक्ष कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। थोड़ी देर में अकेला देख वह गोपू के पास पहुंच गया।अब तक चैसरिये भी जा चुके थे।



क्या हुआ गोपू? ऐसे नाराज नहीं होते बेटे, तुम तो पढ़े-लिखे समझदार हो। शहर में ग्रेजुयेट कर रहे हो, वो और कुछ नहीं तो तुम्हारे पिता हैं। छोटे भाई सुखनाथ ने गोपू को पुचकारते हुये कहा।



अरे, देखो ना काकू! बाबूजी थेाड़ी-थोड़ी बात पर बेवजह चिल्लाने लगते हैं। इसीलिये तो मैं गांव नहीं आता। मां ने कितनी बार कहा होगा तब कहीं तीन सालों में तो आ रहा हूं, आप तो जानते हैं।







ठीक है, पर ऐसे नहीं बोलते।भैया की पूरे गांव में तूती बोलती है, हम कदर नहीं करेंगे तो ये रैयत भला क्यों करने चले? काका सुखनाथ ने समझाते हुये कहा।



काका, जमाना कहां पहुंच गया...।एक दिन कह दिया कि कुछ खेत बेचकर शहर में एक होटल खोल लेते हैं, दिन-दूनी रात चैगुनी तरक्की होगी।...बिना सोंचे-समझे भड़क गये, कहने लगे- मैं जीते जी एक इंच जमीन नहीं बेचूंगा।हूं... ऐसे कलेजे से लगाकर रखे हैं जैसे सब अपने साथ ही ले जायेंगे।



ठीक ही तो कहते हैं गोपू, अब इस पर नाराजगी तो ठीक नहीं।हम सब पुरखों के जमीन के पहरेदार तो हैं।उसी की पहरेदारी करते हुये बस फसल खाते रहें, कई पीढ़ीयों तक चलेगंी। क्या बुरा है, उनका कहना...? सुखनाथ ने बड़े भाई का पक्ष लेते हुये कहा।



और खुद ऐश कर रहे हैं तो?



देखो गोपू, ऐसा नहीं कहते।



आप तो उनके भाई लक्ष्मण हैं, मुंह ही नहीं खोल सकते। काकू! कह दूंगा, तो अच्छा नहीं लगेगा, सोंचों जरा! ये कोई उमर है? जिसको पता चलेगा हंसेगा, थंूकेगा हम पर। सोंचा है... मुझे कितनी शर्म आयेगी, यार-दोस्तों के बीच ये सब बताने में। अरे! तीन क्या कम हैं? लगता है बाबूजी क्रिकेट टीम तैयार करेंगे।



देखो गोपू, अब तुम कुछ ज्यादा कह रहे हो?



क्या ज्यादा काकू...! ये सब दकियानुसी देहातीपन है। गांव-देहात में कुछ काम-धाम तो नहीं।बस...।



गोपू के विद्रोही रूख को देखते हुये सुखनाथ ने कुछ ज्यादा ना कहना ही बेहतर समझा और बडे़ भाई काशीनाथ के पास आकर बैठ गये।

                                                             (3)

काशीनाथ सुनयना को मन ही मन बार-बार कोसते एकांत में चिंतित मुद्रा में बैठे हुये थेे।विचार कर रहे थे, चलो उसके पास तो दस तरह का लफंदर काम है, पंच-पंचायती के लफड़े से लेकर लगान-जुर्माने तक का, पर सुनयना को तो ये सब देखना चाहिये।कितनी बार कहा होगा, बच्चों को ज्यादा लाड़-प्यार मत दो।पांच साल तक लाड़ो फिर चैदह तक ताड़ो, पर सुनयना ये सब समझे तब ना।मन ही मन विचार कर रहे थे, वाकई बच्चों को बिगाड़ने में मां का ही ज्यादा हाथ होता है।



सुखनाथ, क्या उपाय है दाउ ? लड़का हाथ से निकला जा रहा है।शहर जाने के बाद कुछ ज्यादा ही... काशीनाथ ने चिंतित मुद्रा में समीप बैठे छोटे भाई सुखनाथ के समक्ष अपनी व्यथा रखते हुये कहा।



नहीं भैया, ऐसा नहीं है। जवानी में गरम-गरम खून होता है।सबको गर्मी रहती है, हम सब भी तो ऐसे ही थे।शादी-ब्याह के बाद जिम्मेदारी आने पर सब ठीक हो जाता है। भैया! मेरी मानो, गोपू का ब्याह कर दो।



पर अभी से...? अभी तो पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई।जमींदार काशीनाथ ने कहा।



भैया, पढ़ाई-लिखाई तो बाद में भी होता रहेगा।और फिर अब छोटा थोड़े ही है, इस उमर में तो हमारे बच्चे हो गये थे।





हां, ठीक ही कहते हो, दीनानाथजी तो कब से कमर में गांठ बांध के पीछे पड़े हुये हैं, मैं ही ध्यान नहीं दे रहा...।



काशीनाथ जी के घर पर बेटी हुई। बाजे-गाजे बजे, पटाखे छोड़े गये, खूब धूम-धड़ाका हुआ। पर मजाल है गोपू पल भर भी बैठकर मेहमानों की जरा सी आवभगत कर ले। जिसे आना है, आये, जिसे जाना है जाये।गोपू को ना इसमें कोई दिलचस्पी थी और ना ही वह इस खुशी में शरीक होना चाहता था।वह तो अलमस्त चुपचाप कुण्डली मारे एक जगह पड़ा रहता।एकांत में बैठे यही विचार करता कि कहां आकर फंस गये, वो तो मां ने अपनी बीमारी का बहाना ना बनाया होता तो वह इस गर्मी में भी घर ना आता।



बात सुनयना तक पहुंची, किसी ने यह भी कह दिया कि बड़े मालिक से दो-चार बात भी हो गयी है। जचकी के उपरांत सुनयना से रहा ना गया।उसने गोपू को पास बुलाया, बिठाकर ठिठोली करते लाड से कहने लगी- क्या बात है बेटा, इस बार उखड़ा-उखड़ा सा है? मन ठीक तो है ना? यार-दोस्तों के बीच कुछ कहा-सुनी तो नहीं हो गयी?



नहीं मां, ऐसा कुछ नहीं है। गोपू ने शंात मन से कहा।



तो फिर, चुप-चुप क्यों है?किसी मुंहचिढ़ी के पल्ले तो नहीं पड़ गया?ठिठोली करते हुये कहने लगी।



क्या मतलब?



खैर छोड़, ये बता तूने दीनानाथ जी की बेटी को देखा?कितनी सुंदर है, सयानी और कितनी समझदार।सुनयना जैसे बातों ही बातों में विवाह की पृष्ठभूमि तैयार करने का प्रयत्न कर रही थी।



देखा ना मां!



कैसी लगेगी हमारे घर बहू की बनेगी तो? सुनयना ने कौतुहल से कहा।



मेरे लिये? मुझे ब्याह-व्याह नहीं करना।गोपू ने मंुह ऐंठते हुये कहा।



तो क्या साधु-सन्यासी बनेगा? गोरखपुरिया बाबा बन जायेगा क्या? सुनयना हंसते हुये कहने लगी।



तो क्या जो लोग शादी नहीं करते, वे सब बाबा बन जाते हैं।मुझे नहीं करनी शादी ब्याह।और करोगे तो ठीक नहीं हेागा...।



बेटा शादी ब्याह से जिंदगी में ठहराव आता है, वरना जिंदगी तो बस नदी-नाले की तरह है और फिर कहते हैं शादी-ब्याह से किस्मत भी तो बदलती है।सुनयना ने प्यार से गोपू के हाथ को वात्सल्य भरा स्पर्श देते हुये कहा।







हां मां, तूने ये ठीक कही।बड़ी बुआ के लड़के को तो हमने देख ही लिया ना! शादी करते ही धांय से किस्मत बदल गयी, राजा से रंक और भिखारी। अब तो ना खाते बन रहा ना उगलते।तलाक भी नहीं हो रहा, दोनो मन मसोसकर अलग-अलग रह रहे हैं। और वो छोटी मामी के भाई..? क्या हाल है? पूरे सात फेरे लिये थे, देख लिया ना हाल..., वह जैसे तिलमिला सा गया। फिर कहने लगा- ये सब शादी-ब्याह बकवास हैं, और फिर दूर जाने की क्या जरूरत है मां... खुद का ही देख लो ना...।कितना सुख मिला है, शादी करके? बताओ? बताओ ना...?



इस बार सुनयना चुप हो गयी, अतीत की कड़वी स्मृतियांे पर किसी तरह नियंत्रण पाते हुये वह क्रोध से गोपू पर चिल्ला पड़ी- देखो गोपू, बहुत हो गया।उन्होने चाहे जो किया, लेकिन अपने बाबूजी के खिलाफ एक शब्द भी कहा, तो ठीक नहीं होगा।


                                                        (4)
रात घर पर बड़े-बूढ़ों की बैठक हुई, काका-काकी, सुनयना और जमींदार काशीनाथ। गोपू का बढ़ता हुआ विद्रोह उन सबके लिये चिंता का विषय था।सबने तरह-तरह से अपने विचार रखे। लेकिन अंत में इस बात पर सभी एकमत थे कि किसी भी तरह, चाहे अनिच्छा के साथ ही क्यों ना हो, गोपू की ब्याह कर दी जावे। उन्हे भरोसा था कि विवाह के पश्चात उसकी निरंकुशता और उद्दण्डता दोनों पर ही लगाम लगाने में मदद मिलेगी।वे सभी भी समाज के अन्य लोगों की तरह लड़की को संस्कारों की पाठशाला और रईस बाप के बिगड़ैल औलादों के रिपेयर करने की गेरेज के रूप में देखा करते।



गोपू ने खूब विरोध किया लेकिन कभी पुरखों की कसमें तो कभी लोकलाज का भय दिखा, जबरदस्ती आनन-फानन में कुछेक रिश्तेदारों की मौजूदगी में दीनानाथ जी की लड़की से विवाह करने का निर्णय ले लिया गया।



घर में बड़ा भारी उत्सव रखा गया, मण्डपाच्छादन, हरिद्रालेपन। तेल-हल्दी की रस्में हुईं, घर पर भोज का कार्यक्रम रखा गया।एक-दो करते-करते ढेर सारे मेहमान को निमंत्रित कर लिया गया। कुछ तो बिन बुलाये भी पहंुच गये, कहने लगे- भैया, हम सोंचे कि जल्दी-जल्दी में हमारा नाम छूट गया होगा, नहीं तो ऐसा कभी नहीं हो सकता कि बड़े मालिक के घर पर शादी-ब्याह का कुछ कार्यक्रम हो और हमें छोड़ दें।सात पीढ़ी पहले का संबंध है, कभी तोड़े नहीं टूट सकता।



घर पर लक्ष्मी विराजमान हो तो मेहमानों और रिश्तेदारों को ना पूछ-परख की जरूरत पड़ती और ना जरा-जरा सी बात पर उनका अभिमान- स्वाभिमान आहत ही होता।वो तो दरिद्री ही सब बीमारियों की जड़ है, हर पल मेहमानों का ऐसे ध्यान रखना पड़ता है जैसे घर पर देवता पधारे हो, पता नहीं किस क्षण किसकी आत्मा दुखी हो जाये और घर से कन्नी काट ले।





गोपू के शरीर पर जैसे धर-बांधकर हल्दी चढ़ाई गयी, रस्में अदा की जाने लगीं।घर पर विवाह गीत गूंजने लगे। बड़ी बेटी जो पास के गांव के किसी लड़के के साथ चार साल पहले भागी थी, लाउडस्पीकर पर दूर से विवाह गीतांे को सुना करती तो व्यथित हो जाती।जवानी का खुमार अब ठण्डा पड़ गया था, दुखी हो सोंचा करती काश!आज वो यदि वहां होती तो घर पर उसकी चलवा-चलती होती। पूरे घर में अगवाई कर रही होती। उसके पूछे बिना पत्ती तक नहीं हिलता।कुंवारी थी तो बात-बात में उसकी मां उससे पूछा करती। सोने के कंगन कहां रखे हैं और वो पाजेब, करधनी कहां हैं? वो हल्दी और मिर्ची का डिब्बा और वो गुलाब जामुन का कनस्तर? जाओ दस-बीस निकाल चैपाल पर पहंुचा दो...। वो तो मां-बाबूजी के रात-दिन के कलह का ही दुख था, थोड़ी-थोड़ी बात पर बेवजह लड़ा करते। फिर बाबूजी ने कभी एक नजर देख तो लिया होता, कि बेटी बड़ी हो रही है, उसे भी बाबूजी का गोद चाहिये, एक हल्का प्यार भरा स्पर्श चाहिये।उसके अंदर की फूटती जवानी के ज्वार को शांत करने उनका वात्सल्य चाहिये...।फिर वो काहे गैरों के प्यार की तलाश में भटक अपना जीवन बर्बाद करती।कहां-किसके झांसे में आकर फंस गयी...।काश! घड़ी का कांटा एक बार फिर घुमकर वहीं आ जाता, फिर दोबारा वह ऐसी गलती कभी नहीं करती। ससुराल अच्छा हो तो मां-बाप की याद भले ना आये, लेकिन यदि वहां दुख मिले तो मायके की याद मरते दम तक शूल बनकर चुभती है।



इधर गोपू उसी उधेड़बुन में पल-पल बड़ी मुश्किल से गुजार रहा था कि कब मौका मिले और वह वहां से भाग निकलेे? बारात जाने के ठीक एक दिन पहले आधी रात गोपू घर छोड़कर भाग निकला। सुबह घर में सबको जब खबर लगी तो अफरा-तफरी मच गयी।लाख दबाने के बाद भी अड़ोस-पड़ेास और गांव तक खबर फैल गयी।रिश्ते-नातेदारों में खलबली सी हो गयी।



जो रिश्ते-नातेदार विवाह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आये थे, वे आपस में खुसुर-पुसुर करते आपस में बतियाने लगे। एक ममेरे भाई ने किसी के कान में कहा- बहुत डींग मारते थे, अब लड़के बड़े होकर फल दे रहे, तो दूसरे ने कहा- अति सर्वत्र वर्जयेत काका। भैया, बहुत अति किये हैं अपनी जवानी में। करनी दिखे, मरनी के समय। अब सब दिख रहा। पास खड़े एक ने कहा- अभी तो शुरूवात है फूफाजी, आगे...आगे देखिये होता है क्या? अभी तो सब फल बाकी है। दूसरे छोर पर एक कमरे में छोटी बहन बड़ी से कहने लगी-इसीलिये कहते हैं दीदी, किसी को हंसना नहीं चाहिये।भगवान सबको बारी-बारी फल देता है।भैया सबको हंसते थे, वो नीच कुल का है...उसके यहां पानी नहीं पीयूंगा, उनके घर नहीं जाउंगा... अब उनके घर पर ही सब दिख रहा। एक दूर की रिश्तेदार कहने लगी- सब जमींदारनई निकल गयी, गांव भर सब थू-थू कर रहे।



गोपू की जगह-जगह पतासाजी की गयी, कहीं नहीं मिला।जमींदार के नाक कटने की नौबत आ गयी।वह चिंतित मुद्रा में चैपाल पर तखत में लेटे हुये थे। सुनयना कहने लगी- क्यों, अब क्या करेंगे? समधीजी को क्या बतायेंगे? लड़की की हल्दी दूजे जो नहीं चढ़ती...।



जमींदार ने गंभीर मुद्रा में कहा- शादी तो होगी, चाहे पृथ्वी इधर की उधर हो जाये, काशीनाथ अपनी जुबान से नहीं फिरता।







कैसे होगी? चिंतित सुनयना पगड़ी उछलने के डर से सहमी हुई थी।



तुम अभी जाओ, मैं देखता हूं। काशीनाथ के आवाज में तल्खी थी।



काशीनाथ बड़े पशोपेश में पड़ गये, इसी चिंता में उन्होने परिवार के पुरोहित से विचार विमर्श किया। पुरोहित ने सलाह दी कि लड़के के बीमार होने, कहीं अन्यत्र चले जाने और अन्य किन्ही कारणों से विवाह में उपस्थित ना हो सकने पर सांकेतिक रूप में पीढ़े के साथ भी कन्या का, अग्नि केा साक्षी मान शास्त्रों में फेरे लेने का विधान है।



पुरोहित की बात मान ली गयी।घर में छोटे भाई सुखनाथ और सुनयना का भी यही मत था कि गोपू कहीं और भागकर नहीं जायेगा, बच्चा है आ जायेगा और आते ही कन्या उसे सौंप दी जायेगी। लड़की के पिता दीनानाथ जी को इन सबके बारे में बता दिया गया। एक दिन बाद बारात लड़की वालों के घर प्रस्थान करनी थी। लड़की को जब इन सबके बारे में पता चला तो उसने मां से मना करते हुये कहा- मां यदि रस्मों रिवाजों में दूजे हल्दी चढ़ने की प्रथा ना हो तो वह विधवा रहना पसंद करेगी पर इस तरह बेमन से किसी के गले का फंदा नहीं बनना चाहती।वो ब्याह नहीं करेगी।



लड़की की मां ने समझाते हुये कहा-बेटा,ऐसा रिश्ता सात पुश्तों में किसी को कभी नहीं मिला। तेरी बुआ को तो देखा ना...,



पर मां... वो... मैं.. मैं ब्याह नहीं करूंगी, उसने रूंआसे स्वर में कहा।



लड़की की मां को लगा कि वह सचमुच मना ना कर दे, उसने लाड से समझाते हुये कहा- बेटा, लड़की गाय की तरह होती है, पिता जिसके खूंटे से बांध दे ना-नुकुर नहीं करते, नहीं तो समाज में हंसने वाले पचास ठहरे।



शादी हुई, लड़की बहू बनकर घर आ गयी। काशीनाथ के मन में गोपू के प्रति अपार क्रोध था लेकिन वह कर भी क्या सकता था।इधर उसकी नवब्याहता बहू असंतुष्ट सी घर के एक कोने में पड़े रहती।घर के काम में हाथ बंटाने की बजाय उसने अपने कमरे को ही कोपभवन बना लिया था। उसके सारे उमंग-उत्साह समाप्त से हो गये थे।वह घर पर कंुवारी बहू के रूप में रह रही थी।लड़की ने एक साल प्रतीक्षा की और अंत में मायके जाकर बैठ गयी।



इधर पूरे गांव में जमींदार के घर की ही चर्चा होती।सब खुसुर-पुसुर करते आपस में कहते- वो कैसे रह रही होगी,क्या कर रही होगी, खाती होगी भी या नहीं? कोई कहता, वाकई बड़े मालिक तो कसाई हैं, बेचारी को खूंटे से बांधकर रखा है।जितनी मंुह उतनी बातें, किसी के मुंह से कुछ तो किसी से कुछं। एक हितैषी वृद्ध ने कहा-अरे बाबू। भगवान मुंह दिया है तो मालिक के घर की बुराई को नहीं दिया, भगवान भजन करो, पुन-प्रताप मिलेगा।किसी ने चुगली करते हुये कहा- अरे भैया, जितनई बड़े आदमीन, उतनई भीतर बड़ पोल। हमार घर दुआर में अईसन होत तो इहि कहे देतिन कि इन गंवारन का कोई जात घर्म नाहिं। अकल-फकल तो हैं नहीं इन भसरभोंग का।घर गृहस्थी चलाये भी नहीं जानेत।



                                                                    (5)



छोटे भाई सुखनाथ को जब लगने लगा कि भैया काशीनाथ के पैरों तले आधार खिसकने लगा है। गाहे-बगाहे उसके थू-थू में वह भी कहीं ना कहीं भागीदार बन रहा है।उसके मान-सम्मान का लाभ उसे कम बल्कि उसकी बदनामी में बेवजह कहीं ज्यादा हिस्सेदार बनना पड़ रहा है, तो उसने कन्नी काटने का मन बना लिया।आज तक भाई के समक्ष कभी जुबान नहीं खोली थी, सो हिम्मत नहीं हुई।लेकिन भाभी सुनयना के सामने यह कहने में देर नहीं की कि भाभी, मीठे-मीठे ही भाईयों के बीच बंटवारा हो जाये तो ज्यादा अच्छा होता है,नहीं तो बांटे भाई पड़ेासी होने से भला क्या लाभा? क्यों ना भईया से कहते...।



जब जमींदार काशीनाथ को छोटे भाई के इरादों के बारे में पता चला तो वे बड़े रूष्ट हुये। उन्हे गहरा सदमा लगा। गोपू के विद्रोह ने उसे उतना झटका नहीं दिया था जितना भाई के अलग होने के इरादे ने। उसने आव देखा ना ताव और जमीन का आधा हिस्सा भाई को देकर उसी दिन रसोई अलग कर दिया।धन जाने पर शक्ति का ह्वास होता देख जमींदार अकुला उठा। गांव में नंबर वन का जमींदार बंटवारा होते ही तीसरे और चैंथे पायदान पर आ गया।रही-सही कसर बेटे गोपू ने पूरी कर दी।वह भी एक दिन घर आ पिता से बंटवारा लेने की जिद्द पर अड़ गया और अपने हिस्से की पचास बीघा जमीन बेचकर शहर चला गया।



धीरे-धीरे अब पंचायत के निर्णयों में जमींदार काशीनाथ के उपस्थिति की अनिवार्यता घटने लगी। चौपाल पर चाय डकारते धुनी जमाकर चौसर खेलने वाले चैसरिये अब काशीनाथ के चौपाल पर जाने कन्नी काटने लगे।पड़ोस के दरोगा और हाकिम गांव से होकर चले जाते लेकिन काशीनाथ को खबर भी ना लगती। एक तरह से काशीनाथ का गांव पर से नेतृत्व खिसकने लगा।घर से आदमी का मान बढ़ता है, घर से घटता है। जब गांव के लोगों ने देखा कि काशीनाथ के नेतृत्व का अनुसरण करने वाले स्वयं उसके घर में कोई नहीं है,तब उसका मान-सम्मान स्वतः ही घटने लगा।गांव में इस नेतृत्व के निर्वात को पूरा करने एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गयी। पूरा गांव कई खेमों में बंट गया। उसकी एक आवाज पर जहां सैकड़ो लोग इकट्ठा हो जाते वहां वह खिसियाता हुआ दिन भर चिल्लाता रहता पर कुत्ता भी भौंकने नहीं आता। जो लोग बेवजह उसकी गलियों में मेल-मुलाकात के लिये पंक्तिबद्ध खड़े होते वे उस गली में जाने से मुंह बिचकाने लगे कि कहीं काशीनाथ से भेंट मुलाकात हो गयी तो बेवजह का ”पाय लागू “ ना करना पड़ जाये।काशीनाथ अपनी इस स्थिति पर बड़ा दुखी रहने लगा। काशीनाथ को अपनी उपेक्षा खलने लगी, इधर घर में अपनों के बीच परायों सी दूरियंा, दरख्ते रिश्ते और गांव में पूछ-परख की कमीं उसे लगातार खटकने लगी और यही हाय उसे भीतर तक खोखला करने लगी।



जीवन भर नेतृत्व थामे हाथों में जब रिक्तता का आभास होता है तो उसे गहरी पीड़ा होती है। अपना दुख दीवारों के भीतर बांटने के अलावा उसके सामने कोई विकल्प नहीं होता। जीवन भर सहज और सामान्य लोगों को दो टके का व्यक्ति समझ दूरियां स्थापित करने वाला वह दीवारों के बीच घुटता हुआ मौत को प्रतीक्षित एक अभिशप्त इंसान बन जाता है।



जमींदार काशीनाथ इस अभिशप्त जीवन को किसी तरह घिसटकर जीता हुआ स्वयं को कमरे की दीवारों के बीच समेट लिया। वह अपनी और अधिक उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकता था। गांव,बस्ती,भाई, पुत्र-पत्नी और अन्य नातों के बीच दरख्ते रिश्तों को महसूस करने और उनका विश्लेषण करने आज उसके पास भरपूर वक्त था।वह महसूस कर रहा था कि कहीं ना कहीं उससे भारी चूक हो गयी। वह बचपन में पिता के साथ कभी खेतों में फसलों को लहलहाता हुआ देखा करता। उसे आज भान हो चुका था कि संतान भी किसान के द्वारा खेतों में रोपे गये बीज की तरह होते हैं। उसे भी फसलों की तरह समय-समय पर संस्काररूपी पोषण की आवश्यकता होती है । जिस तरह फसलों को खरपतवार से बचाने कई बार निंदाई-गुड़ाई की जाती है, ठीक उसी तरह संतान की वृद्धि के साथ दुर्गुण भी खरपतवार की तरह पनपते हैं। जो इंसान एक समझदार पिता के रूप में इन खरपतवारों की गुड़ाई कर उसे हटाने में समय रहते समर्थ हो जाते हैं वे एक सफल पिता कहलाते हंै और जिनके पास संतानों के इन दुर्गंणों की गुड़ाई के लिये वक्त नहीं होता वे भले ही आकाश पर महिमामंडित होते रहें पर अंततः वे संतान ही उसके पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जमींदार को आज इस बात का ज्ञान हो चुका था कि तास-चौपड की मियाद पर बच्चों में संस्कारों की नींव नहीं डाली जा सकती।

शनिवार, 7 अगस्त 2010

सरहद

अरे! क्या हुआ...?, पूरे गांव में ये कैसा श्मशान सा सन्नाटा पसरा है, सब ठीक तो है ना पार्वती? अरे! कहां हो?

घर आ कुर्ते को आस्तीन से अलग करता पंकज एक कमरे से दूसरे कमरे किसी अन्जाने भय से भयभीत अधीर हो अपनी पत्नी को ढूढ़ रहा था, लेकिन पार्वती अंदर कमरे में दुबकी पलंग पर लेटी हुई थी। पंकज की आवाज सुन सहमी सी बरामदे तक आ गयी। बिटिया को आंचल में छिपाये एक कोर से चूहते पसीने को पोंछती थरथरायी आवाज में कहने लगी-

सुनो! घर से बाहर मत निकलना, दो गुटों में बलवा हुआ है।
बोलते हुये जिव्हा लड़खड़ा रही थी,अधर कांप रहे थे, आंखों में एक अजीब सी भयमिश्रित खामोशी थी, वह बेहद डरी हुई थी। बार-बार कभी आंचल से चेहरे का पसीना पोंछती तो कभी बिटिया के सुर्ख लबों पर ममता का दामन पसार ढाढस बंधाने का प्रयत्न करती।

क्या कहा? बलवा...? पंकज ने आंखें फाड़कर आश्चर्य से पार्वती की ओर देखते हुये कहा।अपने पैंतालीस बरस की उम्र में गांव में उसने आज तक हाथापाई तक ना देखी थी, ऐसे में बलवा जैसे शब्द उसके लिये दिन में किसी डरावने सपने से कम नहीं थे।

हां...।डरी हुई सिर हिलाती पार्वती ने कहा।

किनके बीच? क्या हुआ? सुबह जब घर से निकला तब तो गांव में सब ठीक-ठाक था, उसकी कौतुहल बढ़ते जा रही थी।

अब छोड़ो भी! बस, खा पीकर चुप सो जाओ ।

अरे! कौन है? क्या है? कुछ बताओगे भी! पंकज ने पुनः अधीर होते हुये कहा।

तुम पहले हाथ मुंह धो लो, फिर बताउंगी।वैसे भी दूसरों का अपने सिर पर मत लिया करो...जमाना खराब है ।

तुम तो ...बस पहेलियां बुझाती रहोगी...। रूको मैं दीनू काका से पूछता हूं, आज तक गांव में किसी ने बकरा नहीं काटा और तुम हो कि... तुम औरतो का तो एक हाथ खीरे का नौ हाथ बीज... वाली बात रहती है। अरे ! कुछ कहा-सुनी हेा गयी होगी और ...
ऐसा कहते हुये पंकज दरवाजा खोल बाहर निकलने का प्रयत्न करने लगा किंतु पार्वती तो जैसे बीच में दीवार बनकर खड़ी हो गयी ।

मैने कहा ना नहीं निकलोगे बाहर, तुम्हे मेरी सौगंध। तुम तो मुछमुण्डे की तरह बन जाते हो यार।एक हाथ से चैखट का उपरी सिरा और दूसरे हाथ से दरवाजे की सिटकनी पकड़ देहरी के बीचोंबीच खड़ी हो गयी।

अरे आखिर हुआ क्या? बताओगे भी।


अरे वो भोपू है ना ! उसके और कालिया के बीच खूब मारपीट हुई है। उन दोनो की लुगाई नल में पानी भर रही थी कि इसी बीच उनकी आपस में तू-तू, मैं-मैं हो गयी, उनके झगड़े में घरवाले कूद पड़े और बस फिर... क्या था, खूब लट्ठ, बल्लम चले, दौड़ा-दौड़ाकर एक दूसरे को पीट रहे थे। मैं तो खाली गुण्डी लेकर भागते हुये घर चली आयी... किवाड़ बंदकर अंदर दुबकी थी..., अभी दरवाजा खोला है...।वो लोग इधर ही दौड़ते हुये भाग रहेे थे ।


किस बात को लेकर कहा-सुनी हो गयी ?


अरे! तुम्हे तो मालूम है ना! एक तो बूंद-बूंद करके नल से पानी टपकता है, बड़ी मुश्किल से गुण्डी भर पानी तो सबको नसीब हो पाती है, तिस पर भी वो हरजाई कालिया की लुगाई पांच ले आयी थी, उसने भोपू की औरत को भरने नहीं दिया और झूमा-झटकी हो गयी।


उसके बाद अब तक तो फिर कुछ नहीं हुआ ना?


पता नहीं, मैं तो तब से घर के भीतर दुबकी पड़ी हूं। एक लंबी सांस खींचते हुये पार्वती ने पंकज से जब कहा तब उसके आशंकित चेहरे से एक अन्जाना सा भय साफ-साफ प्रतिबिंबित हो रहा था।

पंकज खामोश पास ही रखी खाट पर सो गया, पार्वती वहीं निकट जमीन पर चिंतित मुद्रा में बैठी हुई थी, उदास मन से कहने लगी- तुम्हे तो जब से कह रही हूं, चलो कहीं अन्यत्र चलें, बेवजह किसी झगड़े में उलझने की प्रतीक्षा करना ठीक नहीं, ये झगड़े- झंझट हम लोगों के बस का नहीं है, वो कहते हैं ना - मारे तो घर से गये, मरे ता जग से गये।सच पंकज... वैसे भी अभाव संघर्ष की जन्मदात्री होती है जो अपने अवसान के पीछे तबाही का एक मंजर छोड़ जाती है और मैं...ऐसे दिन नहीं देखना चाहती।


पंकज खामोश था अपनी पत्नी की बातों को गौर से सुन रहा था।


व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में सहजता से घर-बार नहीं छोड़ा करता, वह तो प्राणों के उत्सर्ग के कुछ क्षण पहले तक परिस्थितियों के अनुकूल हो जाने की आश लिये प्रतीक्षा करना चाहता है।लेकिन पार्वती अधीर थी, वह पंकज को विश्वास दिलाना चाहती थी कि अवसान की बेला समीप देखकर भी जो किसी दैवीय चमत्कार की बाट जोहते प्रतीक्षा करते हैं, ईश्वर उन्हे किंकर्तव्यविमूढ़ समझ संघर्ष में अकेला छोड़ देते हैं।महमूद गजनवी ने जब सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया तो ना जाने कितने लोग मूर्तियों से लिपट किसी चमत्कार की अपेक्षा करते रहे और गजनवी गाजर मूली की तरह सबको काटता हुआ स्वदेश प्रस्थान कर गया।


पार्वती ने फिर से पंकज की ओर देखते हुये कहा-

चलो ना! गांव छोड़कर दो महीनों के लिये कहीं दूसरी जगह चलें, यहां तो नदी, तालाब, पोखर सब बैसाख में ही सूख गये, पीने को गांव में बूंद भर पानी नहीं है। फसाद की जड़ इस सरकारी नल का हाल तो देख ही रहे हो, दस बार चलाओ फिर भी कटोरे भर नहीं निकलता। यही हाल रहा तो मर जायेंगे बिन पानी के। वैसे भी आधे से ज्यादा गांव वाले तो पहले ही कहीं-कहीं जा चुके हैं, बता रहे थे सैकड़ों फुट तक गांव में कहीं पानी नहीं हैं। पिछले हफ्ते से सरकारी दुकानों में पानी का वितरण शुरू हुआ है उसके लिये भी लूटमार मच जाती है, जितना मिलता है वह तो उंट के मुंह में जीरे की तरह है। चलो अब चलकर कहीं प्राण बचायेंा...। पार्वती ने जब निराश मन से पंकज के समक्ष यह प्रस्ताव रखा तो वह भी जैसे कुछ सोंचने पर विवश हो गया।


कहां जायेंगे पार्वती? चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, कहीं भी किसी गांव में पानी नहीं है ।

जहंा भी दो बूंद आसरा दिखेगा वहीं रह लेंगे। यहां तो खग, मृग, पशु, सब पहले ही या तो गांव छोड़कर चले गये या फिर परलोक सिधार गये। चलो यहां से प्लीज! धन-दौलत मोह माया सब इस शरीर के रहते तक है, यही ना रहा तो फिर काहे का गांव और अपनी धरती। दो-चार, दस-बीस घर ही तो बच गये हैं वो भी लड़मर के यहीं खप जायेंगे, पार्वती की आवाज में एक बेबसी भरा अनुरोध था ।

कहां जायेंगे? कहीं भी पानी नहीं है पार्वती, नदियों में पाईप लाईन बिछाकर जो पानी शहरों की ओर लाया जा रहा है, उसको भी लोगेां ने कई जगहों से काट डाला है, आदमी एक दूसरे के खून का प्यासा हो चुका है । गिलास भर पानी के लिये लोग एक दूसरे का खून बहा दे रहे हैं।बताओं ना ऐसे में ....।


तो मर जायें यहीं? क्या मरने के पहले कुछ भी प्रयत्न नहीं करोगे? बस डेढ़-दो महीने की ही तो बात है, जैसे ही आषाढ़ आयेगा, घर आ जायेंगे।


तो, तुम्ही बताओ ना कहां चलें? पंकज ने जैसे विवशता से पार्वती की बात स्वीकार कर ली थी।


चलो ना समुंदर किनारे किसी शहर की ओर चलते है। सुना है, सरकार इन शहरों में समुंदर के पानी को पीने लायक बनाने बड़ी-बड़ी फैक्ट्यिां लगायी हुई है। वहां पानी आसानी से मिल जायेगा।


ठीक है बताओ ना कहां चलें? पंकज ने अपनी पत्नी की ओर देखते हुये कहा।


चलो मुम्बई चलते हैं, कोई ज्यादा दूर नहीं है, बस दो महीने तो काटना है।

बात तो ठीक कह रही होे, पर...

पर...वर कुछ नहीं प्लीज!

बात तो  ठीक ही कहते हो...सही में एकाध के ... पंकज की आंखे भावना के रवों में बह हल्की-हल्की गीली हो रही थी

अब कोई अशुभ बात मत कहो..., जितनी जल्दी हो सके निकल चलें और मैं तो कहती हूं, कल शाम की गाड़ी से ही चले चलते हैं।

दोनो दूसरे दिन दोपहर के भोजन के उपरांत अपनी दस साल की बिटिया आशू को साथ ले मुम्बई के लिये निकल पड़े, लेकिन मुम्बई की राह इतनी आसान नहीं थी। वहां जाकर क्या खायेंगे, क्या पीयेंगे यह एक अहम् सवाल था और यही प्रश्न पंकज को लगातार खाये जा रही थी। पांच साल से धरती ने अन्न का एक दाना भी नहीं उगला था, बड़ी मुश्किल से सरकारी कोटे के राशन-पानी से तो गुजर चल रहा था, ऐसे में भीतर ही भीतर खोखला करती सोंच आखिरकार पंकज के जुबान पर आ ही गयी।


तुमने सोंचा है पार्वती, वहां क्या खायेंगे, क्या पीयेंगे? चिंतित पंकज ने अपनी पत्नी की ओर देखते हुये कहा।


जो भी मिलेगा, जैसा मिलेगा खा लेंगे, जहां मिलेगा रह लेंगे, वैसे भी जिनके पास रहने को कुछ नहीं होता, उसे फुटपाथ पर खुदा की नीली छतरी नसीब हो ही जाती है।पहले प्राण बच जायें फिर इज्जत और स्वाभिमान। वैसे मैंने एक बड़ी गठरी में दलिया और सत्तू रख लिये हैं, दो महीने चल जायेंगे। खाने की चिंता नहीं है, बस किसी तरह हलक की प्यास बुझ जाये- पार्वती ने सीट के नीचे गठरी की ओर इशारा करते हुये कहा।


मुम्बई के व्ही.टी.स्टेशन पर उतरते हुये रात के सात बज चुके थे। दोनों ने बाहर पास ही कहीं खाली जगह तलाशना शुरू किया लेकिन अंत में दो किलोमीटर दूर फुटपाथ पर बड़ी मुश्किल से खाली जगह नसीब हुई। वे सफर के दौरान पूरी तरह थक चुके थे, घर से लाये हुये जल की अंतिम बूंद को हलक के नीचे उतार वे तीनों पश्त हो जमीन पर लेट पैर पसार कर सो गये। आंते जब कुलबुलाती हैं तो जिव्हा स्वाद के नखरे भूल जाती है और आंखेंा में अकुलाहट हो तो उसे किसी मखमली सेज की जरूरत नहीं होती। लेटते ही क्षण भर में सभी को नींद ने अपनी आगोश में जकड़ लिया।


रात के लगभग १० बज रहे थे, अचानक बेटी आशू प्यास से रोने लगी, कहने लगी- पापा, प्यास लगी है, पानी दो ना..।


पंकज ने घर से लायी अपनी बड़ी पानी की जरेकिन उठाकर देखा तो उसमें बूंद भर पानी नहीं था, इधर-उधर ढूढ़ने का प्रयत्न किया पर ना तो वहां नल सदृश कुछ दिखायी दिया और ना ही कुछ समझ में आया। पास ही कंबल ओढ़कर सोये एक वृद्ध से दिखने वाले व्यक्ति को जगा उसने कहा- भाई साहब, यहां कहीं पानी मिलेगा? बिटिया प्यास से रो रही है।

उस अधेड़ से दिखने वाले व्यक्ति ने पंकज को गौर से देखा, किसी भय से जैसे चारो तरफ नजर दौड़ायी, फिर समीप आ धीरे से कहा- कहां से आये हो?

जी घोराडोन्गरी  से, भोपाल के पास है।

मराठी नहीं आती? उस व्यक्ति ने पुनः प्रश्न करते हुये कहा।

जी नहीं, केवल हिंदी आती है ।

क्यों आ गये यहां मरने के लिये...।

क्या करोगे भाई साहब! गांव में नदी-नाले सब सूख गये, इसीलिये बस प्राण बचाने यहां आये हैं।

ठीक है, पर यहां हिंदी मत बोलना, नहीं तो जिन प्राणों को बचाने के लिये इतनी दूर आये हो, वह बेवजह उखड़ जायेंगे।

वो देखो... शोर हो रहा है, लगता है गुण्डे, मवालियों की टोली इधर ही आ रही है। चुपचाप कंबल ओढ़कर सो जाओ, जब वो कुछ पूछेंगे तो जवाब मत देना। ये लो मराठी अखबार, सिरहाने में रखकर सो जाओ, इससे उन्हे लगेगा, तुम गूंगे जरूर हो पर मराठी जानते हो ।

पर बिटिया के लिये पानी...वो प्यास से रो रही है ।

उनको जाने दो, फिर जुगाड़ करेंगे, तब तक आंखों से गिरते आंसुओं से हलक की प्यास बुझाने को कहो।

थोड़ी ही देर में कुछ मवालियों की टोली सारे फुटपाथ को खंगालते हुये जोर-जोर से चिल्लाते हुये उन तक पहुंच गयी- आमची मुम्बई।

इथा कोन-कोन आहे ? कोन आये साला। कंबल खंींचते हुये एक लड़के ने पंकज से पूछा- तुमी पन मराठी मानुष?


हाथों से इशारा करता हुआ पंकज अपनी पत्नी और बच्चों के सामने बैठ अखबार को हिला-हिलाकर दिखाने लगा, जैसे वह उन्हे समझाने का प्रयत्न कर रहा था कि वो गूंगा जरूर है, पर मराठी है।


इसी बीच उस अधेड़ से दिखने वाले व्यक्ति ने उनके समर्थन में मराठी में कहा- ये लोग मराठी है भाउ, बेचारा बोल नहीं सकता।

ठीक आये, तुमी झोपुनसा ..., ऐसा कह कंबल को उनके उपर फेंकते हुये वे वहां से जाने लगे, तभी अनायास बिटिया फिर से रोने लगी और उसके मुंह से अचानक निकल पड़ा- पापा प्यास लगी है, पानी!

उस नन्ही सी बिटिया की आवाज मवालियों की उस टोली के पीछे चल रहे एक व्यक्ति को सुनाई दे गयी, उसने जोर से चिल्लाते हुये कहा- अरे! खेाटे मराठी मानुष।

मारो सालों को, मारो इस तरह जोर-जोर से चिल्लाते हुये वे सब उल्टे पांव लौट पड़े, उनकी भाषायें अब परिवर्तित हो चुकी थी। उस समय ऐसा लग रहा था जैसे अचानक बहेलियो की टोली को कोई  शावक का शिकार मिल गया हो, वे सब उस दंपति पर टूट पड़े । उस नन्ही सी बच्ची को उठा सड़क पर फेंक दिया, वह रोती बिलखती चिल्लाती रही- पापा...पापा ...पर उसकी चीख पुकार का उन शैतानेां की टोली पर भला क्या फर्क पड़ना था। वैसे भी जब कोई भीड़ हिंसा पर उतर आये तो वह इंसानियत का चोला उतार शैतान बन जाता है, मानवता उससे कोसों दूर पलायन कर जाती है। कहते हैं भीड़ सदैव विवेकहीन हुआ करती है और अगर यदि इसे राजनीतिक वरदहस्त प्राप्त हो जाये तो फिर यह पूरी तरह विक्षिप्त हो जाया करती है।


पार्वती अपनी फूल सी मासूम बच्ची को उठाने के लिये जैसे ही दौड़ी... कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया और गालों पर थप्पड़ों की बरसात करने लगे, पंकज को तो पहले से ही चार मवाली पकड़कर बेंतों से पीट रहे थे, वह बचाओ-बचाओ चिल्ला रहा था, लेकिन आसपास फुटपाथ पर सोये हुये भलेमानुष की शक्ल में नपुंसको को इससे क्या फर्क पड़ने वाला था ।

दर्द से कराहती वह नन्ही सी मासूम चिल्लाती रही- पानी पिला दो अंकल, बहुत प्यास लगी है।

तेरे बाप का घर है साली, अपना जमीन नंगा भूखा करके इधर दौड़े चले आये । पानी मांगती है, ऐसा कहते हुये एक ने फिर से पीटना शुरू कर दिया।

बच्ची का असह्य दर्द देख पार्वती हाथ छुड़ाने का प्रयत्न करती गिड़गिड़ाने लगी- भैया पानी पिला दो बच्ची को, प्यासी है ।

बेशरम, बेहया, शर्म नहीं आती, भिखारी बनकर आते हेा, अरे! तेरी इस नौटंकी को पानी पिलायेंगे तो हमारे बच्चे क्या पीयेंगे, पिला साले को गटर का पानी। उसका ऐसा कहना था कि उसके एक साथी ने सामने से एक बोतल उठा टूटे हुये गटर से पानी निकाल बच्ची के मुंह पर ठूंस दिया।

प्यास से तड़पती बच्ची के लिये तो वह गटर का पानी भी उस समय किसी गंगाजल से कम नहीं था।


पार्वती चिल्लाती रही, मत पीना बेटा, मत पियो... पर आशु तो एक ही झटके में पूरा गटक गयी।

वे सब लगातार उन दोनों को पीट रहे थे तभी पार्वती ने चिल्लाते हुये कहा- अरे! एक राजपुतानी के राखी पर मुगल सम्राट ने उस पर आक्रमण का विचार तक छोड़ दिया था, मैं जब से तुम्हे भैया कह रही हूं... छी! तुम लोग उससे भी गये बीते हो। अरे! तुम भी तो हिंदी में हमें गाली दे रहे हो, क्या फर्क है तुम्हारी और हमारी हिंदी में...।

पार्वती के मुंह से इतना सुनना था कि वे बौखला गये- मारो साली को, बहुत बोलती है।

और आखिर में वे तीनों जब लश्त पड़ गये तो एक पिंजरेनुमा गाड़ी में भरकर व्ही.टी.स्टेशन तक ले आये और कटक जाने वाली चलती गाड़ी में ठूंसकर चढ़ा दिये।

मार से लश्त रात भर ट्ेन के एक कोने में बैठ तीनों कराहते रहे। पंकज कभी पार्वती को ढाढस बंधाता तो कभी बिटिया के आंसू पोंछता अखंड भारत की इस विभाजित तस्वीर को देखकर रोता, कभी पीठ पर पड़े बेंतों के लंबे-लंबे निशान को पास ही खिड़की पर लगे कांच पर उभर आयी प्रतिबिंबों से देखने का प्रयत्न करता तो कभी सूजे हुये पैर में, कराहती मानवता को गहराई से महसूस करता। इस बेइंतहा दर्द के पश्चात भी वह चुप था, जानता था कि उसकी जरा सी उफ उन दोनेां को तोड़कर रख देगी।

रात जैसे-तैसे बीती तो दिन के उजाले में भी आशा की कोई किरण दूर-दूर तक दिखायी नहीं दे रही थी, कहां रहेंगे, कहां जायेंगे जैसे प्रश्न अनिर्णित रूप में किसी हल की आश लिये अभी भी मुंहबांये खड़ी थी। रास्ते में विचार आया कि यदि किस्मत गाड़ी के सहारे कटक ले जा ही रही है तो क्यों ना वहीं नजदीक ही पुरी जा जगन्नाथ जी के चरणों में स्वयं को अर्पित कर कुछ दिनों के लिये शरण मांगे । वैसे भी जाने कितने लोग मंदिर के प्रसाद और दर्शनार्थियों के जूठन खाकर बरसों जिंदा रह लेते हैं तो फिर उन्हे तो बूंद भर पानी मात्र चाहिये थी, वह भी महीने दो महीनों के लिये।


बंगाल की खाड़ी से उठती हुई तूफानी हवायें मौसम को आर्द्र कर रही थी, हल्की-हल्की उमस से बदन चिपचिपा हो रहा था, लग रहा था जैसे कटक स्टेशन समीप आ चुकी है। फिर भी स्टेशन पहुचंने में अभी लगभग आधे घण्टे का विलंब था कि सादे लिबास में कुछ लोग डंडा पकड़ चढ़ने लगे, पंकज और पार्वती तो उन्हे देख डर के मारे कांपने लगे, उन्हे एक बार फिर मुम्बई की याद ताजा हो आयी। उन्हे शंका होने लगी, जब उनसे रहा नहीं गया तो पास ही बर्थ पर बैठे एक सज्जन से उन्होने पूछ ही लिया- भाई साहब! क्या ये पुलिस के लोग हैं?


नहीं-नहीं, ये उड़िया स्वयंसेवक हैं,ये अपनी सरजमीं की रखवाली के निये जान भी दे देते हैं । ये घूम-घूमकर पता लगाते हैं कि कोई गैर उड़िया उनकी धरती पर कदम रख इनके संसाधनों में बंटवारा लेने का प्रयत्न ना करे।

क्या आप भी यहीं के रहने वाले हैं?


जी हां ।

पर आप तो...

जी-जी, वास्तव में मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हूं, मेरा घर यहीं है, गर्मी की छुट्टियां बिताने घर जा रहा हूं, वैसे भी उधर गर्मियों में पानी की बहुत किल्लत रहती है।

बात अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हो पायी थी कि कटक स्टेशन पर गाड़ी घीरे-धीरे खड़ी होने लगी, उससे वे कुछ और पूछ पाते कि वह उतरने वालों की लंबी कतारों में कहीं गुम हो गया । स्टेशन पर जब गाड़ी खड़ी हुई तो जोर-जोर से कुछ आवाजें सुनाई दे रही थीं, गौर से सुनने पर पता चला कि विभिन्न भाषाओं में एनाउन्समेंट हो रहा है, कोई सिरफिरा जोर-जोर से चिल्लाता हुआ कुछ कह रहा था। जब हिंदी में कुछ आवाजें आयी तो पंकज और उसकी पत्नी कान लगाकर बड़े ध्यान से सुनने लगे, वे जोर-जोर से कह रहे थे- कृपया कोई भी गैर उड़िया मृत्यु को दावत देने के लिये कटक की धरती पर उतरकर यहां के संसाधनों में बंटवारा ना लें। हम मौत के सौदागर नहीं हैं लेकिन हमारे हिस्से की रोटी और जल कोई छीनने का प्रयत्न करेगा तो हम उसे बर्दाश्त भी नहीं कर पायेंगेें, यदि कोई ऐसा पाया गया तो वे अन्जाम भुगतने के लिये तैयार रहें ।

उनकी बातें सुन वे डर के मारे एक बार फिर से कांपने लगे, दूध का जला छांछ भी फूुककर पीता है, पार्वती ने धीरे से कहा- चलो यहां से, यहां नहीं उतरेंगे।


किसी देश के भीतर ही जहां भाषा की सरहदों से सीमा की रेखायें खींची जाती हों वहां मौत किसी बूचड़खाने में बिकने वाली मांस की तरह होती है। अब तो पंकज पूरी तरह टूट चुका था, वह निराश मन से पत्नी से कहने लगा- चलो पार्वती! जहां जिस्म के रंगों और भाषाओं में मानवता कैद होती है वहां मृत्यु का कोई भरोसा नही।

वे वहां से किसी अन्यत्र स्थान की तलाश में निकल पड़े किंतु उनके सामने अब भी यक्ष प्रश्न यही था कि वे बचे हुये डेढ़ महीने कहां काटे। हताशा के उन क्षणों में ना तो उनके सामने बहुतायत में विकल्प थे और ना ही देश की तात्कालिन राजनीतिक व्यवस्था में फटी-चिथड़ी मानवता की तुरपाई करने की कूबत ही थी। काफी सोंच विचार के पश्चात थक-हार उन्होने कुछ दिन चेन्नई में बिताने का निर्णय लिया और इस तरह वे ट्ेन के रूट में थोड़ा परिवर्तन कर चेन्नई के लिये रवाना हो गये। चेन्न्ई का विकल्प चुनने के पीछे जहंा महज पार्वती की जिद्द  थी , उसे विश्वास था कि उसका रूपरंग दक्षिण की भौगिलिक जलवायु से मेल खाती जिस्म के रंगों से पूरी तरह ना केवल अनुकूल है , अपितु उस भीड़ में इतनी सहजता से उन्हे पहचान पाना संभव भी नहीं ।

चेन्नई स्टेशन पर उतरकर सबसे पहले पार्वती ने गजरा खरीदा और नाक के बांये तरफ को छिदवा एक कील पहन ली,वह उस समय बिल्कुल तमिल स्त्री की तरह लग रही थी। कहते हैं यदि मातृभूमि छोड़ने से प्राणों की रक्षा हो सकती हो या भेष बदलने से तात्कालिक क्षणों में संकट का निवारण हो सकता हो तो व्यक्ति को रंच मात्र भी सन्कोच नहीं करना चाहिये। पार्वती ने इन उसुलों को जैसे बचपन से रट्ट घंोंटकर पी लिया था।


आंतों की अकुलाहट और हलक से उठती प्यास से जिव्हा अकुलाने लगी, कुछ देर आराम करने के पश्चात पार्वती वहीं जमीन पर आंतों में उठती असह्य दर्द को छिपाती लेट गयी। पत्नी का दर्द बहुत देर तक जीवनसाथी से छुपकर भला कहां रह सकता है, पार्वती के दर्द को पंकज महसूस करने लगा था, उसने अपनी पत्नी के हाथों को अपने हाथों में लेते हुये कहा - तुमने तीन दिनों से कुछ खाया ना पीया, सिर्फ हम दोनांे को खिलाते रहे, खा लो प्लीज!


नहीं पंकज मैं उपवास हूं।


तीन दिनों तक ?

हां पंकज, आंते विवशता की भाषा भले ना समझती हों पर आस्था के समक्ष नतमस्तक हो जाती हैं, और फिर तुम दोनों ने खा लिया, समझो मेरा पेट भर गया।


पार्वती की बातें सुन पंकज की आंखें नम हो आयीं, पर उनकी बातों से अन्जान अनंत आकाश को निहारती उस नन्ही बालिका के लिये भाषा की सरहदें और भौगाोलिक सीमाओं के बीच दम तोड़ती मानवीय मूल्यों के भला क्या मायने थे? वह दिन भर की उमस और गर्मी से फिर एक बार प्यास से तड़प उठी।प्रश्न फिर से वही ंथे और उसकी इस बार की इच्छा भी किसी गुड्डे, गुड़ियों जैसे खिलौनों या तमंचे की ना होकर महज पानी की कुछ बूदों की थी । वह नितांत अबोध नहीं थी, वह जानती थी कि इसी पानी की उसकी तीव्र इच्छा ने उसके माता-पिता की किस तरह दुर्दशा की थी, किस तरह बेंतों की मार से पापा की डबडबायी आंखे अब भी खामोश होकर कुछ कह रही हैं।वह बहुत देर तक तो प्यास को भीतर दबाकर रखी लेकिन उसकी सहनशक्त् िकी भी एक सीमा थी, रोकने की तमाम कोशिशों के बावजूद आंसू की कुछ बूंदे बाहर छलक ही गयी।


संतान की पीड़ा मां से भला कहां छिपी रह सकती है, उसके आंसुओं की भाषा समझते उसे देर ना लगी।

बेटी, प्यास लगी है?पार्वती ने अपनी बिटिया के आंसुओं को आंचल से पोंछते हुये पूछा?


आशू ने जब सिर हिलाकर हां कहा तो जैसे आंखों में देर तक रूकी सारी बूंदे किसी बारिश के पानी की तरह तुरतुराकर बहने लगीं।

देखो तो कहीं पानी दिख रहा ? पार्वती ने चारो तरफ नजर दौड़ाते हुये पंकज से पूछा।

यहां तो कहीं पानी नहीं दिख रहा, मैं बाहर कहीं देखता हूूं, ऐसा कहते हुये वे प्लास्टिक की बोतल उठा जाने लगे तभी पार्वती ने अचानक उत्तर की ओर लगी भीड़ की दिशा में इशारा करते हुये कहा-

ओ देखो, लंबी-लंबी कतारे ! लगता है वहां कोई जल वितरण व्यवस्था है, शायद हमारे इधर की तरह सरकारी व्यवस्था होगी, देखो तो शायद वहां मिल जाये। नहीं-नहीं, तुम मत जाओ, तुम यहीं रूको... तुम बच्ची का ध्यान रखना, मै जाकर देखती हूं।


वह भीड़ बहुत दूर नहीं थी, पार्वती भी उसी कतार में जाकर खड़ी हो गयी। उस समय वह बिल्कुल तमिल वेशभूषा में थी और उसे उन सबसे अलग पहचान पाना बेहद कठिन था। अपनी बारी का इंतजार करती बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा कर रही थी, वह देख रही थी कि खाकी वर्दी पहना सरकारी मुलाजिम जल वितरण करते हुये उनसे तमिल में कुछ बातें भी कर रहा था। जब पार्वती की बारी आयी तो उस व्यक्ति ने उससे भी तमिल में कुछ पूछा, लेकिन वह अन्जान सी खड़ी रही। जब फिर से उसने कुछ पूछा तो इशारे में हाथ हिलाते हुये यह बताने की चेष्टा करने लगी कि वो बड़ी दूर से आयी है। उसके इशारों से उस व्यक्ति को शक हो गया, उसने जल के पेकेट में लिखे कुछ अक्षरों को पढ़ने के लिये हाथ बढ़ाया तो पार्वती की समझ में आ गया कि यहां भी व्यक्ति की पहचान शायद भाषाओं से होती है। उसने छोटी-मोटी तमिल का उपयोग करते हुये अपनी भाषा में कहा- अन्ना पानी दे दो प्लीज़! बिटिया प्यास से रो रही है।


उस व्यक्ति का इतना सुनना था कि वह गुस्से से आगबबूला हो गया उसने  दुत्कारते हुये उसे वहां से भगा दिया, वह खाली हाथ लौटकर आ पंकज के पास निराश होकर बैठ गयी।

क्या हुआ नहीं मिला पानी?

मत पूछो पंकज चलो, वापस घर चलें ।

पार्वती , अब कहां जाओगे, पहले बिटिया के पानी की व्यवस्था करेा, प्यास से तड़प रही है, मर जायेगी।रूको मैं देखता हूं, ऐसा कह उन्होने भी कुछ  करने की चेष्टा की लेकिन अंततः निराशा ही हाथ लगी, थक हारकर वह भी खाली हाथ लौट आया।

उसी समय पार्वती की नजर किसी आगन्तुक की प्रतीक्षा कर रही एक संभ्रांत महिला पर पड़ी- उसने उनसे अनुनय करते हुये कहा- बहन जी, पानी प्लीज ला दो, हमें कोई  यहां पानी नही दे  रहा, बिटिया प्यास से तड़प रही, पति भी प्यास से लश्त हो चुके हैं।

तू इधर काहे को आया- उस स्त्री ने प्रश्न करते हुये पार्वती से कहा।


बहन जी अब हमें क्या मालूम था...पानी ला दो प्लीज़ फिर अब की बार लौटकर नहीं आयेंगे।


हम तुमको पानी देगा और साथ में भोजन भी देगा जितना दिन रहेगा, पर तुमको हमारा एक बात मानना पड़ेगा- वह स्त्री टूटी फूटी हिंदी में बोल रही थी।



उस स्त्री में आशा की किरणें देख पार्वती की आंखों में एक अनोखी चमक आ गयी, पंकज भी पुलकित नयन से उसकी ओर अपलक निहारने लगा।

हां बहन जी बोलो ना, कहो प्लीज़! मैं आपकी जिंदगी भर गुलामी कर लूंगी, मेरे पति और मेरी बिटिया के प्राणों की रक्षा कर दीजीये, बस। मैं आपका अहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी- वह हाथ जोड़ गिड़गिड़ाने लगी।

नहीं हम तुमको क्या करेगा, हमको तुम्हारा बेटी चाहिये, बोलो देगा?

बहनजी क्या करेंगी, मेरी बेटी का... क्या आपकी कोई बेटी नहीं है, अपनी बेटी समझकर पालना चाहती हैं, तो रख लीजीये पर प्राण बचा दीजीये , आखिर यशोदा भी तो मां की तरह होती है। मैं देवकी बन आपकी गोद में अपनी बेटी को निहार लूंगी।


नहीं, मेरा कोई संतान नहीं है, तुम्हारा बेटी को हम मंदिर में चढ़ायेगा, पंडित ने कहा है, जब हम कोई देवदासी चढ़ायेगा तब हमारा कोई बच्चा होगा।

नहीं बहनजी, ऐसा अनर्थ मत कहो, वो तो नन्ही सी मासूम है, जिसने अभी दुनिया देखी नहीं है, गुड्डे, गुड़ियों के खेल में संसार का स्वरूप ढूंढ़ती उस बच्ची को दुनियादारी क्या मालूम? आप ही मां बनकर इसे पाल लीजीये, आपका प्यार मिलेगा, तो धीरे-धीरे मुझे खुदबखुद भूल जायेगी।


नहीं, हम जो बोला, वो मानेगा, तभी हम तुमको पानी देगा, नहीं तो...।


वह असहाय सा निरूत्तर अपने पति की आरे देखती रही... पंकज की आंखों से आंसू की अविरल घारा बहने लगी, उसने रूंवासे स्वर में कहा- पार्वती हां कह दो, बेटी कहीं भी हो जिंदा तो रहेगी, प्राण उखड़ गये तो किस काम का...।


पंकज की सहमति पा, उस महिला की बातों में भारी मन से पार्वती ने हामी भर दी और अपने कलेजे के टुकड़े को उस स्त्री को सौंप दिया। वह उस स्त्री को सौंपते हुये आशू को छाती से चिपका थोड़ी देर बिलखकर रोती रही लेकिन एक मां का वात्सल्य तो हर हाल में अपने संतान की सलामती चाहता है चाहे वह उसके पास रहे या फिर दूर।


वह महिला उस बच्चे को पाकर प्रफुल्लित हो गयी और पानी से भरे एक बड़े प्लास्टिक बेग को उन्हे सौंपते हुये ढेर सारा खाने का सामान छोड़ चली गयी। बच्ची अपनी मां से विलग हो चिल्ला-चिल्लाकर रोती रही, लेकिन वह स्त्री उसे उसी क्षण कार में लेकर वहां से निकल गयी ।

बड़े प्लास्टिक की थैली में पानी से भरा बेग पास ही रखा था, एक गिलास में पानी निकालते हुये पार्वती ने कहा- लो पानी पी लो।

नहीं पार्वती मुझसे यह पानी पीया नहीं जायेगा, यह तो मेरी बिटिया की कीमत है।ऐसा कहते उसकी आंखो से बहती हुई आंसू की बून्दे खुले मुंह में धधकती जीवित मुखाग्नि को शांत करने का प्रयत्न करने लगी। बिटिया बेचकर जल की यह बूंद ... हे भगवान! मौत क्यों नहीं आ गयी, ये दिन दिखाने से पहले। वह रो-रोकर चिल्लाता रहा ।

एक पुरूष की आंखों से जब आंसू की बूंदे छलकती हैं और उसके साथ मुख से कुछ शब्द पीड़ा में प्रस्फुटित होते हों तो वह बड़ा ही हदयविदारक क्षण होता है,पुरूष ऐसे ही अकारण नहीं रोता, लेकिन जब रोता है तो ....

पी लो प्लीज... अपनी बिटिया तो खेा ही चुकी अब मैं और ...

क्या होगा, मर जायेंगे ना! इससे ज्यादा और क्या होगा, यह भी... किसी मरने से कम थोड़े ही है, तिल-तिलकर पश्चाताप के आंसू के साथ जिंदगी भर मरने से तो अच्छा था एक ही बार मर जाते, पर ये कमबख्त मौत भी जब बुलाओ तो कहां आती है।

वे दोनेा कुछ दिन तक भूखे-प्यासे सड़क पर तड़पते पड़े रहे लेकिन जब सब कुछ असह्य हो गया और पार्वती ने भी जब अन्न जल का पूरी तरह त्याग कर दिया तो पंकज के सामने उस स्त्री के दिये टुकड़ो पर गुजर करने की विवशता हो गयी।कुछ दिन तो बस जैसे-तैसे घुट-घुटकर जीते हुये उस महिला की दी भीख पर दोनो गुजारा करते रहे, लेकिन महीने-डेढ़ महीने पश्चात वह भी अब खत्म होने की कगार पर आ गया था।

चलो ना! अब घर चलें, आषाढ़ का एक पखवाड़ा बीत गया, उम्मीद है हमारी धरती पर भी अब इन्द्र की कृपा हो गयी होगी। पार्वती ने रोते हुये कहा।


हां पार्वती, तुम ठीक कहते हो, चलो! मैं भी एक-एक क्षण को जैसे युगों की तरह यहां काट रहा हूं।

देख लिया ना अपना घर छोड़ बाहर भटकने का फल ।


मुझे क्या मालूम था पंकज कि पूरी धरती भाषा और कौम की सरहदों में बंट चुका है, यहां तो जैसे हर गांव एक रियासत हो गया और हर कस्बा एक वतन। चलो! अब कहीं नहीं जायेगे।अपने ही गांव की धरती को सबके साथ मिलकर मेढ़बंदी करेंगे, अपनी धरती से एक बूंद पानी बाहर नालों में नहीं बहने देंगे।

हंा पार्वती, अपनी पड़ती जमीन को मैं इस बार इस बार तालाब और पोखर बना पानी से लबालब कर दूंगा और सचमुच ऐसी जगह पर हम दोबारा लौटकर नहीं आयेंगे, यहां तो पूरा देश भाषाओं की सीमारेखाओं में बंट चुका है। - पंकज ने उदास होकर जब कहा तो एक असह्य पीड़ा उसके चेहरे से साफ झलक रही थी।


दोनो गठरी उठा निकल पड़े फिर से उस सफर को, एक असह्य पीड़ा के दर्द को समेटकर । सफर भर वे सिसकते रहे लेकिन उनकी सिसक की गूंज सत्ता के उस गलियारे तक भला कहां पहुंच पाती जो समरसता की जड़ों को खोदकर स्वयं के लिये सत्ता की नींव खड़ा किया करते हैं। वैसे भी राजनीति एक वेश्या की तरह होती है जिसे वरण करने वाला व्यक्ति उसी वेश्यागामी पुरूष की तरह हो जाता है जिसके लिये नैतिकता और मानवता जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं।


दो दिन के सफर के उपरांत घर आ खाट निकाल बाहर बरामदे में वे बैठ गये बस कुछ सोंचते-विचारते एक धधकती ज्वाला को अंदर में समेटे हुये। बेटी की याद में बहते हुये आंसू अधरों की मूक व्यथा को स्वयं में समेटकर हदय की धधकती प्रतिशोध की ज्वाला को शांत करने का प्रयत्न कर रही थी, किंतु वह तो अग्निकुंढ में पड़े घृत की भांति उसे और अधिक तीव्रता से प्रज्जवलित कर दे रही थी।


अपना तो सब कुछ लुट गया ना पंकज...।पार्वती ने रोते हुये कहा।


पंकज खामोश था आखिर वह कहता भी क्या, स्त्री की ममता जब रोती है तो पुरूष के सामने खामोशी के सिवा कोई विकल्प नहीं होता, वह अपने सिसकते अधरों के सहारे शब्दों को मुखरित करने का प्रयत्न करता रहा किंतु वह भी उस सेमय बेमानी से हो गये ।


पार्वती नहा-धो भोजन बना पंकज के लिये थाल सजाकर खाने के लिये रख दी, बड़े दिनों के पश्चात घर की रोटी और दाल देखने का मिल रही थी।


लेकिन भोजन का निवाला इतनी जल्दी भला कहां हलक के नीचे उतरता है, वह सामने थाल को रख बैठा हुआ पानी की कुछ बूंदे फेर अर्चना कर ही रहा था कि अचानक उसी क्षण फिर जोर-जोर से शोर होने लगा- पार्वती डर गयी वह हांफते हुये फिर से बाहर निकली - सहमी हुई भागते लोगों से पूछने लगीं- क्या हुआ भैया, फिर क्या लफड़ा हो गया?

अरे भाभी, वो भोपाल से चेन्नई जाने वाली ट्ेन पटरी से उतर गयी है, कोई सरकारी राहत अभी तक नहीं पहुंच पायी है। बच्चे, बूढ़े, महिलायें सभी पानी और भोजन के लिये तरस रहे हैंै, बच्चे रोते हुये चिल्ला रहे हैं।


हूं..., कहते हुये वह उल्टे पांव लौट आयी ।


क्या हुआ पार्वती किसको इस तरह उलाहना दे रही हो ।

अरे ! कुछ नहीं, रामू बता रहा था, भोपाल से चेन्नई जाने वाली ट्ेन पटरी से उतर गयी है, बता रहे थे लोग भूख, प्यास से तड़प रहे हैं। आखिर ईश्वर सबको करनी का फल तो देता है ना!

क्या कह रही हो तुम, ऐसा नहीं कहते पार्वती, किसी को कुछ हुआ तो नहीं ना? पंकज जैसे अधीर हो गया था।

नहीं, कुछ नहीं हुआ।

चलो पार्वती, हम भी चलें और ऐसे संकट के समय उनकी मदद करें।

नहीं, मैं नहीं जाउंगी, हमने इन्ही जालिमों की जमीं पर अपनी बेटी खोयी है।

ऐसा नहीं कहते पार्वती, मैं एक मां का दर्द समझता हूं, पर ...यह ठीक नहीं है। यह वही धरती है जिसने यवनों, कुषाणों, मुगलों और ना जाने किन-किन को अपनी छाती पर बिठाकर स्नेह से सींचा, पल्लवित किया। अतिथि देवो भवः हमारी पहचान है, इसे मत खोओ प्लीज़! जो हुआ उसे भूल जाओ, हम अपनी पहचान खो देंगे तो कौन पहचानेगा इस भारत को, जिसकी अनेकों माताओं ने दुश्मन को भी अपनी छाती का दूध पिलाया है, फिर तो ये अपने हैं।


चलो जो भी हमारे पास है, ले चलो, प्लीज! ऐसा कहते हुये अपने लिये निकाली भोजन की थाल और बाल्टी भर पानी ले निकल पड़े ।

पार्वती असमंजस सी खड़ी कुछ दूर तक उन्हे देखती रही, फिर वह भी निकल पड़ी घर के समस्त पके भोजन को एक बड़े बर्तन पर रख गुण्डी भर जल के साथ, अपनी असह्य पीड़ा को सिरहाने पर वहीं आंसुओं के साथ छोड़ उनकी मदद करने।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

शर्त

क्या हुआ, क्या कहा उन्होने? क्या आज भी राजी नहीं हुये? मना कर दिया? बोलो ना? तुम्हारे अधरों पर बिखरे हुये धुसरित मौन मेरी धड़कनों की तीव्रता को और तेज कर रही है, कहो ना प्लीज़... अधीर होकर मधु ने जब अपने पति की कलाई को पकड़ कुरेदना शुरू किया तो महेश भी झल्ला उठा ।


अरे! मधु तुम तो...आकर बैठे हुये दो मिनट भी नहीं हुये होंगे, कि शुरू हो गये...।


तुम क्या समझोगे एक मां के वात्सल्य की पीड़ा को? तुम्हे क्या पता कि जब बिन ब्याहे जवान बेटे या बेटियां घर पर हो तो कैसे एक मां की ममता चीत्कार मारकर रोती है। किसी अनहोनी के डर से किसी मां का वात्सल्य किस तरह सहमा-सहमा सा होता है। कैसे जीवन के रंगीन पृष्ठ भी कोरे उजाड़ से लगने लगते हैं...। वैसे भी जब समाज का संपूर्ण जीवनदर्शन एकाकीपन की नींव पर टिका हो तो क्षण-क्षण नैराश्य के पल होते हैं, ऐसे में कहां और किससे बांटेंगे उस दर्द को, जो बच्चे मां बाप से नहीं बांट सकते। ऐसे समय एक साथी की जरूरत होती है, पत्नी के रूप में, तुम नहीं समझ सकोगे एक मां की व्यथा को...।


तो क्या करूं तुम्ही बताओ ? महेश ने तैश में आकर कहा।


अरे! कौन सा मैं तुम्हे परछाई देखकर मछली की आंख में निशाना लगाने को कह रही हूं, कुछ भी तो नहीं मांगा उम्र भर तुमसे, बस बुढ़ापे में एक बहू ही तो मांग रही हूं। बेटे की उम्र ढलती जा रही है, अब इस उम्र में विवाह नहीं करोगे तो क्या उसके चैथेपन की प्रतीक्षा करोगे? वैसे भी वह चालीस का हो चुका। इस उम्र में हमारी शादी को बीस बरस हो गये थे, पीयूष इण्टर पास कर लिया था। पिछले दस साल से लड़की ढूंढ़ रहे हो, क्या एक भी नहीं मिली?


अरे मधु, लड़कियां बाजारों में थेाड़े ही मिला करती हैं, जब चाहो खरीदकर ले आये और तुलसी के पौधे की तरह आंगन में लगा दिये। लड़कियां हैं ही कितनी समाज में? अपने ही मुहल्ले में देख लो, सौ जवान मुसकुण्डे लट्ठ-लट्ठ घूम रहे हैं पर लड़कियां बीस भी नहीं होंगी, अब अस्सी को तो घूमना पड़ेगा ना...। अरे! वो दिन लद गये जब लड़कियंा मारी-मारी फिरती थीं, बाप के चप्पल घिस जाते थे दुल्हे की तलाश में।ट्कों दहेज भरकर सामान और सोने चांदी के जेवरातों से लाद देते तब भी लड़के वाले राजी नहीं होते थे। एक मर गई तो दूसरी और दूसरी मरी तो तीसरी, संतू काका के तो पांच शादियां हुई थी, सभी एक से बढ़कर एक सुंदर।


मैं कुछ नहीं जानती, मुझे एक बहू चाहिये... पोते की अधूरी चाह लेकर मैं मृत्यु का वरण नहीं करना चाहती, वरना मेरी मोक्ष की चाह एक अधूरे स्वप्न के रूप में जिंदगी भर मुझे सालती रहेगी?


अरे ... ऐसे भावुक नहीं हुआ करते । ईश्वर पर भरोसा रखो...वैसे भी कहते हैं, समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कुछ मिलता भी नहीं है। समझ लो समय नहीं आया... हां कल पंडित दीनदयाल जी आ रहे हैं., एक लड़की के बारे में इलाहाबाद में खबर चली है,.. हम तीनों कल इलाहाबाद चलेंगेा- पत्नी की पीड़ा को अंतस्थल तक महसूस करते हुये सेठ महेशचंद्र गुप्ता जरा भावविभोर हो गये थे ।


चलो भगवान का शुक्र ह,ै एक जगह उम्मीद टूटती है तो दूसरी ओर आशा की किरणें किसी झरोखे से आती भी दिखायी देती है...सचमुच इन्ही सब को देखकर तो लगता है कि भगवान इस दुनिया में है वरना तो...भरोसा ही उठ जाता । कैसा घर द्वार है?... नहीं-नहीं अब जैसा भी हो चलेगा। मधु ने अपनी उत्सुकता को भीतर दबाने की चेष्टा करते हुये कहा।


बहुत रईस लोग नहीं हैं, साधारण परिवार है और सहज रहन-सहन भी । लड़की सामान्य पढ़ी लिखी है, सीधे सादे लोग हैं, कोई विशेष लाग लपेट नहीं है। वैसे भी पुरानी कहावत है- बिटिया दियो उंचा दर्जा औ बहू लायो नीचो दर्जो । वैसे भी अपने से कम संपन्न परिवार में बिटिया ब्याहने पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी तो रहता है और फिर आखिर हमें भी गरज है...।



ये लोग तो राजी हो जायेंगे ना?



अब ये तो पता नहीं, लेकिन जब इतना नीचे गिरकर हम रिश्ता करने को राजी हो गये हैं, तो उम्मीद है लड़की वाले भी खुशी-खुशी मान जायेंगे, अब यही उम्मीद कर सकते हैं, बाकी उपर वाला जाने- महेश ने आशा भरी निगाहों से मधु की ओर देखते हुये कहा, उसकी आंखों में बुझते हुये दीये की अंतिम लौ की भांति एक अनोखी दीप्ति थी, किंतु वाणी में एक कसक भी थी ।



ठीक है, ... हमें कुछ ज्यादा चाहिये भी नहीं । एक बहू मिल जाये... बस... अरे रूपये-पैसे तो भगवान का दिया बहुत है, बस किसी तरह वन्श  चल जाये और बुढ़ापे में एक सहारा मिल जाये।वैसे भी सारी दुनिया पा लेने की अभिलाषा भला किसे नहीं होती? लेकिन आकांक्षा के विपरीत मनुष्य की लब्धियों को ही तो शायद भाग्य कहा जाता है और ऐसा लगता है, हमारी तकदीर में शायद इन्ही के साथ रिश्ते नातों का संयोग लिखा है। कब जा रहे हैं हम इलाहाबाद? - उसने समीप बैठे अपने पति से बड़ी उत्सुकता से पुनः प्रश्न करते हुये कहा।



कल चलेंगे, पंडित दीनदयाल जी आज शाम आ रहे हैं, फिर कल सुबह ही चलेंगे ।



मधु के लिये 24 घण्टे के उन प्रतीक्षाभरे पलों को काटना बेहद कठिन हो गया। वैसे भी प्रतीक्षा की चंद घड़ियां ही बेहद कष्टकारक होती है फिर एक दिन व्यतीत करना तो मानेा युगों सा हो गया।एक-एक पल कठिन हो गया... समय के प्रवाह को अपनी इच्छा के अनुरूप मोड़ने का प्रयत्न ही तो कदाचित् प्रतीक्षा का दूसरा नाम है, लेकिन दुर्भाय से वक्त मनुष्य के हाथों नियंत्रित होती कहा है ? वरना वह तो पल भर में घड़ी की सुईयों को चैबीसों बार घुमा देता। मधु हर पल बहू के बारे में कल्पना करती मन ही मन बुदबुदाती रही... क्या हुआ बहुत संपन्न लोग नहीं है, संस्कार तो होंगे। वैसे भी दूसरो के दिये रूपये भला कितने दिन काम आते हैं,अपने कमाये का तो भरोसा नहीं, फिर पराये धन की कौन कहे..।आखिर हम उनसे कुछ मांग-जांच नहीं रहे, तो उसके दिल में, हमारे प्रति एक नरम कोना भी तो रहेेगा, जो बुढ़ापे में हमें उसका आसरा पाने और बची खुची जिंदगी खुशहाली से जीने में हमारी मदद करेगा।

 नाकामी और असफलता की बंजर भूमि में सदैव संतोष के बीज अंकुरित हुआ करते हैं।मधु समझ चुकी थी कि पराभव की उस पीड़ा को कम करने के लिये संतोष के सिवा उसके पास दूसरा कोई सर्वोत्त्म औषधि नहीं है।



दूसरे दिन सुबह-सुबह वे तीनों इलाहाबाद के लिये निकल पड़े, इलाहाबाद उनके घर से बहुत दूर नहीं था, दो घण्टे का सफर आसानी से कट गया। सुषमा ने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी, भारी भरकम स्वर्णाभूषणों से तन को ढकने का प्रयास करती उसका पीतवर्ण उस समय ऐसे प्रतीत हो रहा था, जैसे मुरझाये हुये पीले गुलाब के पुष्प को काठ से लपेट जैसे किसी ने श्रृंगारित करने का प्रयत्न किया  हो। बुढ़ापे का दोष आभूषणों से दबा नहीं करता और जवानी का सौंदर्य किसी श्रृंगार का कभी मोहताज नहीं होती। मधु यह सब जानती थी लेकिन स्त्रियां अपने सौंदर्य के प्रति कुछ ज्यादा ही आ्यावादी होती हैं , तभी तो कुरूप स्त्री भी जब आईने के समक्ष खड़ी होती है तो स्वयं को कभी बद्सूरत नहीं समझती ।



लड़की वालों के घर पहुंचते ही पूरे परिवार में अफरा-तफरी मच गयी, सभी उनके स्वागत सत्कार में मशगूल हो गये। धन संपत्ति के मामले में अत्यंत साधारण होने के कारण वे उनके सत्कार के प्रति कुछ ज्यादा ही संवेदनशील थे, वे उनके स्वागत में कोई कमीं नहीं होने देना चाहते थे।अमीरी और गरीबी दोनो में लाख असमानताओं के बावजूद एक समानता अवश्य होती है, दोनो ही आडंबर पसंद होते हैं एक सब कुछ उघाड़कर अपने वैभव का प्रदर्शन करना चाहता है तो दूसरा अपने चिथड़ेपन को उधार की आडंबरनुमा सुई से तुरपाई कर ढकने का प्रयास करता है, लेकिन गरीबी छिपाने से भला छिपती कहां है, वह तो मूक होकर भी बोलती है।कच्चे- पक्के मकानों के मिश्रण से बने मकान की दीवारें उनके हालात को बयां कर रही थी किंतु महेश और मध्ुा को तो सिर्फ लड़की चाहिये थी।



लड़की जब तश्तरी में पानी से भरा गिलास लेकर आयी तो उसके सौंदर्य को देख दोनों की बांछे खिल गयी। गौर वर्ण, मांसल देह, घी चुपड़ी शरबती गेहूं की मोटी रोटियों की तरह फुले हुये पुष्ट गाल, तीखे नाक नक्श उसके सौंदर्य को और अधिक आकर्षण का केंद्र बना दे रही थी। मधु ने झट प्रश्न करते हुये कहा- बेटी कितना पढ़ी हो?



जी... बी.ए.किया है...। लड़की ने उनकी ओर देखते हुये कहा।



अच्छा है, हमें ज्यादा पढ़ी लिखी चाहिये भी नहीं, बस घर के कामकाज सम्हाल ले और फिर हमें कौन सी नौकरी करवानी है। इस बिगड़ी हुई कानून व्यवस्था और लचर प्रशासनिक तंत्र के बीच लड़कों की सुरक्षा का तो कोई भरोसा नहीं, फिर औरतों का क्या ठिकाना।



जी! वो तो ठीक है, पर हमारी बेटी नौकरी करना चाहेगी... तो रोकियेगा मत। समीप बैठी लड़की की माताजी ने तपाक से कहा।



अरे बहनजी। घर में कोई कमीं थोड़े ही है, तीन पुश्तों तक ये बैठकर खायेंगे तब भी कम नहीं पड़ेगा, गांव में पहले नंबर का कारोबार है, हां कोई ऐब ना आये... वरना तो, समुंदर का पानी भी कम पड़ जाता है।अमीरी का वैभव जब गरीबी की देहरी पर दस्तक देती है तो वह सदैव वस्त्रविहीन हो जाया करती है।



महेश ने मधु की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा और जैसे मौन सहमति प्राप्त करते हुये झट से कह ही दिया- लड़की हमें पसंद है, आप लग्न और अन्य रस्मों की तैयारी कीजीये।



भाईसाहब वो तो सब ठीक है, लेकिन हमारी एक छोटी सी शर्त है? लड़की के पिता रमेश गोयल ने अनुरोध भरे स्वर में जब सेठ महेशचंद्र से कहा तो वे थोड़े और भावुक हो गये, कहने लगे-



कैसी शर्त? अरे आप बिल्कुल चिंता मत कीजीये भाई साहब, हमें कोई दहेज नहीं चाहिये, बाराती भी थोड़े ही आयेंगे, आप अपनी हैसियत के अनुसार खर्च कीजीयेगा, समझ रहे हैं ना?



वो तो सब ठीक है, सेठ जी पर...



पर क्या? कह तो दिया ना हमने, क्यो मधु? अपनी पत्नी की ओर मुखातिब हो सेठ महेशचंद्र जब यह कह रहे थे तो उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी।



मधु का चेहरा भी गर्व से फूला नहीं समा रहा था, उसने लड़की के पिता की ओर देखते हुये तपाक से कहा- हां भाई साहब, हमें कुछ भी नहीं चाहिये, ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है, आपकी बेटी हमारे घर राजरानी बनकर रहेगी ।



हां बहन जी, पर मेरा 12 साल का एक बेटा भी है, मुझे आगे चलकर उसका भी तो विवाह करना होगा, मैं उसके लिये लड़की कहां ढूढ़ूंगा, ऐसा करिये मुझे मेरी लड़की के बदले, एक लड़की दे दीजीये। अभी विवाह ना करिये पर सगाई करके रख दीजीये ताकि समय आने पर बहू के लिये मुझे दर-दर भटकना ना पड़े । लड़की के पिता ने बड़े सहज भाव से कहा।



लड़की के पिता के मुंह से इतना सुनना था कि पास ही सटकर बैठी मधु का माथा ठनक गया, बड़ी मुश्किल से माथे पर उभर आये क्रोध को दबाते हुये कहने लगी- भाई साहब आप तो जानते हैं, हमारा एक ही बेटा है, हमारी कोई बेटी नहीं है और फिर आपका बेटा तो अभी छोटा सा बच्चा है जो शायद विवाह का मतलब भी नहीं जानता होगा, उसकी चिंता...?



हां बहन जी, पर बच्चों के जवान होने में वक्त ही कितना लगता है, पलक झपकते बच्चे शादी के लायक हो जाते हैं, रिश्ते नातों में किसी की तो बेटी होगी? हम उससे अदला बदली कर लेंगे, हमें वह भी मंजूर होगा।आप चिंता मत करिये हम दो-तीन साल तक आपकी प्रतीक्षा कर लेंगे, वैसे भी हमें अपनी पुत्री के विवाह की जल्दी नहीं है।आप हमें साल भर से लेकर पांच साल तक की कोई लड़की दे दीजीये, हम उसे ही बेटी की तरह पाल-पोंसकर बड़ा कर लेंगे और समय आने पर अपने बेटे से विवाह कर लेंगे।



भाई साहब, यही सब करना होता, तो हम आपके घर रिश्ता मांगने भला क्यों आते? मधु जैसे तिलमिला सी गयी।



बात बिगड़ते देख सेठ महेशचंद्र थोड़ा संयमित हो गये, उन्होने पूरा माजरा सम्हालते हुये कहा- देखिये भाई साहब, हमारे रिश्ते नातों में कोई भी बेटी अब शेष बची नहीं है, जो थी उनके अब विवाह हो चुके हैं, ऐसे में हम आपकी शर्त भला कैसे पूरी कर पायेंगे? हमें तो लगा था कि आपको यह जानकर और खुशी होगी कि आपकी बिटिया को ननंद-वनंद का कोई झंझट नहीं है। अब तो मैं सिर्फ आपसे अनुरोध ही कर सकता हूं, आप अपनी बेटी हमें दे दीजीये, फिर जब रिश्ते जुड़ जायेंगे तब आपकी समस्या, हमारी उदर पीड़ा सी होगी। हम दोनो परिवार मिलजुलकर अच्छी लड़की ढूंढने का प्रयत्न करेंगे ।



क्षमा करना सेठ जी... मैं ऐसी गलती नहीं करना चाहता, अभी बिटिया के बहाने तो कम से कम लड़के के लिये कुछ लोग बिटिया देने राजी भी हो जाते हैं, ये हाथ से चली गयी, तो मुझे भी कमर में रस्सी बांध घूमना पड़ेगा, मैं आपको नहंी थोड़े ही कह रहा, मैने कहा ना आपसे, मुझे दुधमुयी बच्ची दे दीजीये, मैं उसके जवान होने की प्रतीक्षा कर लूंगा।



देखिये भाई साहब... अब ये तो वही बात हुई जैसे... , खैर छोड़िये... अब कोई जोर जबरदस्ती तो है नहीं.  वैसे भी हम ना तो कोई दहेज-वहेज मांग रहे और ना ही आपसे कोई लंबी चैड़ी डिमांड कर रहे, ऐसे लड़के वाले कोसों दूर तक ढूढ़ने से भी नहीं मिलेंगे,- मधु ने अपनी उदारता का बखान करते हुये कहा।



बहन जी पैसे तो बहुत कमा लेंगे, पर लड़की कहां से लायेंगे, लड़कियां पैसे में नहीं मिला करती और ना ही बाजारों से खरीदी जा सकती, यदि ऐसा ही होता तो बताईये ना, भला आपको क्या कमीं थी? पैसे से लड़कियां मिलतीं तो आपके पास तो हजारों लड़कियों की मीलो लंबी लाइन लग गयी होतीं।



लड़की के पिता रमेशचंद्र गोयल दूरदर्शी विचारों के धनी थे, उन्हे इस बात का भलीभांति भान हो चुका था कि किस तरह पूरे सामाजिक संरचना को लड़कियों की न्यून संख्या प्रभावित करने लगी है, किस तरह संपूर्ण सामाजिक ढंाचा परिवर्तन की कगार पर खड़ा अंगड़ाई ले रहा है, ऐसे में वे कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे।



मधु ने सेठ महेशचंद्र गुप्ता का हाथ पकडते हुये कहा- चलो जी, इतने नखरे मुझे पसंद नहीं, और ऐसा कहते हुये वह महेश की उंगलियां खींचते हुये बाहर निकल गयी। वह गुस्से से तिलमिला रही थी, उसके अंग प्रत्यंग से झरती हुई खीझ, उसके सिकुडे हुये नाक और भौं तथा आंचल को कमर से लपेट एक सिरे को दांतों से कुतरते उसके समस्त हावभाव ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे उसने अपने संपूर्ण आवरण को क्रोध से ढक लिया हो। वैसे भी स्त्रियों का क्रोध झरने की तरह होता है जो एक बार फूट गया तो उसे नियंत्रण करना स्वयं उसके बस में नहीं होता।



बहनजी, नाराज मत होईयेगा, यह समय की मांग है, मैं कोई अतिरिक्त या अनावश्यक शर्त नहीं लाद रहा, ढूढ़ियेगा, जरूर किन्ही रिश्तेदारों के पास, कोई तो बेटी होगी। मैं तीन साल तक आपकी प्रतीक्षा करूंगा।



बाहर निकल सेठ महेशचंद्र गुप्ता, अपनी पत्नी के हाथों से अपना हाथ झटकते हुये कहने लगे - बस इतने से ही मन व्यथित हो उठा, तुमने सिर्फ एक बार प्रत्युत्तर सुना और आपा खो बैठे। सोंचो! मैं दस साल से यही सुन रहा हूं, पर अपनी पीड़ा तुम्हे बांटने से भी भला क्या फायदा?तुम मुझे हमेशा उलाहना दिया करते, लेकिन मैं खामोश हो जाता, आखिर क्या कहता तुम्हे? पुरूष की छाती चौड़ी होती ही इसीलिये है, ताकि दुनिया भर के दुखों और गमों को बर्दाश्त कर वह स्वयं में समाहित कर सके।




तुमने मुझे अब तक कहां बताया कि वे बहू के बदले हमसे एक बेटी मांग रहे हैं।



कैसे बताता मधु तुम्हे? आखिर तुम्हारे उस भ्रुण  क्षरण का दोषी तो मैं भी रहा हूं, मैंने भी तुम्हारे साथ उन पापों का वरण किया है, और कुछ पाप ऐसे होते हैं जिनकी प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न पीड़ा को हंसते हुये लंबे समय तक भोगना पड़ता है, इनके प्रायश्चित का प्रावधान शास्त्रों और विधानों में नहीं होता।



बस-बस मत दिलाओ उन पापों को याद। मेरा तो रूह कांप सा जाता है, कभी-कभी मेरे अंदर की आत्मा चीत्कार उठती है। लगता है जैसे उसी जीवहत्या का पीड़ांतक दोष मेरे भाग्य में ग्रहण लगाये हुये है- मधु का चेहरा ग्लानि से भर आया ।



कार अपने गंतव्य दिशा की ओर जा रही थी, वे दोनो बैठे हुये आपस में बातें कर रहे थे, पंडित दीनदयाल जी लड़की वालों का आतिथ्य स्वीकार कर वहीं रूक गय थेे। मधु उन क्षणों में अतीत में खो गयी, पुराने लम्हे याद आते ही उसकी आंखें नम हो आयीं। वे सारे क्षण उसके जेहन में एक वृत्तचित्र की भांति घूमने लगे । उसे अनायास याद आने लगे वे क्षण, जब प्रथम गर्भाधान पर बिटिया होने का पता चला था। कैसे सबकी भांवभंगिमायें शून्य हो गयी थीं, किस तरह सबने तीन दिनों तक खाना नहीं खाया था। घर में लंबी चैड़ी किचकिच के उपरांत किस तरह महेश और उसकी सासु मां ने उसे गर्भपात के लिये तरह-तरह के हथकंडे अपना राजी किया था, एक अस्पताल से दूसरे और दूसरे से तीसरे, अंत में गर्भपात कराकर ही सबने चैन की सांस ली थी। एक बेटी होने के नफे नुकसान से किस तरह लंबे चैडे़ व्याख्यान देकर उसकी संवेदनाओं पर मरहम लगाने की चेष्टा की गयी थी।उसके बाद तो फिर जैसे सारी संवेदनायें ही मर गयी, एक के बाद दूसरी और तीसरी, फिर ना जाने कितने...? शायद पांच बार ही तो कराये थे... और ऐसा सोंचते हुये उसके होंठ इन्ही शब्दों के साथ फड़क पड़े ।



क्या कहा? एक बार फिर से बोलो- महेश ने कहा।



कुछ नहीं, बस यूं ही...।क्या कहीं भी कोई बालिका शिशु नहीं मिलेगी? चलो ना, चलकर कहीं पता लगाते हैं...।



पता नहीं मधु... ऐसा कहते हुये सेठ महेशचंद्र ने जैसे लंबी सांस खींची ।



वे दोनों उंचे से उंचे दाम देकर बेटी गोद लेने आस-पास के शहरों के अनाथालयों और शिशु स्थलों के चक्कर लगाते रहे किंतु सफलता हाथ नहीं लगी और लंबी कोशिशों के उपरांत भी किसी मूल्य पर उन्हे बालिका शिशु ना मिल सकी।उन दोनो ने कहीं-कहीं जाकर कुछ रिश्तेदारों से भी मिन्नतें की, याचना की पर कोई भी उन्हे किसी शर्त पर अपनी बेटी देने को राजी ना हुआ।



समाज की गति चक्रीय तरीके से प्रवाहमान रहती है, जिसमें पुरूष और स्त्री के अल्पाधिक होने का चक्र भी अपने तरीके से निरंतर गतिमान रहता है तभी तो कभी स्त्री की अधिकता उसे मूल्यविहीन बना सड़कों पर कचरे की भांति अस्तित्वहीन बना देती है तो कभी उसे इतनी मूल्यवान बना देती है कि बहुपति विवाह की कुप्रथा जैसा भयावह असंतुलन समाज के समक्ष कई प्रश्न छोड़ जाता है। मधु को समाज का वह भयावह सच आज सामने दिखायी देने लगा था, किंतु अब इन सबके लिये कुछ विशेष प्रायश्चित करना उनके समक्ष शेष भी नहीं था।



कठिनाई और वेदना का वह पल दिनों में और दिन महीनों में परिवर्तित होते गये किंतु परिणाम वेदनाहरण के किसी बिंदू तक नहीं पहुच सका, मधु असहाय और निरीह सा महसूस करने लगी, थक हार उसने सेठ महेशचंद्र के समक्ष प्रस्ताव रखते हुये कहा- क्यों जी, एक बात कहूं- क्या इस उम्र में मैं मां नहीं बन सकती?



तुम्हारा दिमाग फिर गया है, किसी ने सही कहा है, औरतों की बुद्धि समय से पहले सठियाती है, सेठ महेशचंद्र ने उपेक्षापूर्ण ढंग से हंसते हुये अपनी पत्नी से जब कहा तो वह थोड़ी चिढ़ सी गयी।



क्यों, अब इसमें क्या दिमाग फिरने वाली बात हो गयी?



अरे! कैसी फिजुल की बात करती हो, गर्भाधान के लिये जिस मासिक चक्र की आवश्यकता होती है, वह तुम सालों पहले व्यतीत कर चुकी हो, फिर भला कैसे यह सब संभव है, तुम्ही बताओ?



मेडिकल साइंस ने आज इतनी तरक्की कर ली है, तो क्या इस पर भी शोध नहीं हुआ होगा, जरूर इस पर भी कुछ ना कुछ तरक्की हुई होगी। हां यह अलग बात है कि हमें जरूरत नहीं पड़ी इसलिये वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं है। जरूर आज ऐसी किसी तकनीक का विकास हेा चुका होगा जिससे स्त्री समय व्यतीत हो जाने के पश्चात भी पुनः रजस्वला होकर गर्भधारण का सुख पा सकती होगी...। क्यों ना हम दिल्ली चलें? आखिर इन पैसों को हम चाटेंगे थोड़े ही, जब तक धन और भोजन दोनों का कोई खाने वाला ना हो तब तक इसका रहना और ना रहना दोनो ही निरर्थक है। हो सकता है, ईश्वर की कृपा रंग लाये और हमें एक बेटी मिल जाये और तब इस बेटी के बदले हमें एक बहू भी मिल जायेगी।
मधु ने अपने पति के सामने यह प्रस्ताव रखा तो सेठ महेशचंद्र गुप्ता को भी स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं हुआ आखिर वे भी संतान के प्रति उतने ही उत्सुक थे । हारा हुआ जुआरी और असफल व्यक्ति वैसे भी सब कुछ लुटा जाने तक प्रयत्न करना चाहते हैं ।



दोनो इसी आशा को साथ लिये दिल्ली से लेकर मुम्बई तक बड़े से बड़े अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे, महंगी से महंगी फीस देकर मधु ने अपना इलाज कराया परंतु डाॅक्टरों ने ऐसी किसी तकनीक से अनभिज्ञता व्यक्त करते हुये उसे बैरंग वापस भेज दिया। इसी बीच चेन्नई के किसी नामी गिरामी चिकित्सा परामर्शदाता से उस दंपति का संपर्क हुआ और उनके नर्सिग होम जाकर दोनो ने सलाह मशविरा किया। उस चिकित्सक ने जर्मनी के किसी शोध संस्थान में इस तरह के ताजा आविष्कार के बारे में बताया जरूर, किंतु साथ ही यह भी कहा कि चूंकि इस पर अभी हाल ही में शोध हुये हैं इसलिये इसके परिणाम की गारंटी नहीं है साथ ही यह काफी खर्चीला भी होगा, किंतु उन्होने मशविरा देते हुये अंत में कहा कि फिर भी यदि पैसे खर्च करने का सामर्थ्य  है तो कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है।



उन्हे बात थोड़ी जंची और इस तरह उस डाॅक्टर का मशविरा मान जर्मनी के उस शोध संस्थान से दोनो ने संपर्क साधा, खर्च के बारे में जब जानकारी ली तो पता चला पूरे इलाज का खर्च लगभग 1 करोड़ रूपये के आसपास होगा, उस पर भी सफलता की गारंटी नहीं थी। कुछ दिनों तक तो उन्हे कुछ भी समझ में नहीं आया, वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे किंतु यह बहुत दिनों तक संभव ना हो सका, मरता क्या ना करता की तर्ज पर दोनो ने घर-खेत सब कुछ बेच दिया, जब उसके बाद भी कुछ रूपये कम पड़ गये तो निकट के रिश्तेदारों से उधार ले ली। जैसे उन्होने निश्चय कर लिया हो कि सब कुछ बेचकर भी यदि वंश की रक्षा की जा सकती हो तो इसमें कोई बुराई नहीं है। विचार आया कि रूपये पैसे तो चंचल और चलायमान होते हैं, इसके दस हाथ पैर.  कभी इसके पास तो कभी उसके पास, इसके नाश होने से पहले ही वंश को प्रवाहमान बनाये रखने के लिये इसका सदुपयोग किया जा सकता हो तो सर्वोत्तम है।



लगभग साल भर जर्मनी के उस शोध संस्थान में मधु का इलाज चला। वहां विभिन्न तरीके से मासिक चक्र को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया गया किंतु उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त ना हो सका, इस बीच धीरे-धीरे जमीन जायदाद सब कुछ कौड़ियों के दाम बिकता गया, वहां रह उन्होने थोड़ी और प्रतीक्षा की लेकिन लंबे इंतजार के पश्चात भी कुछ विशेष हासिल ना हो सका। अंततः दोनो निराश होकर भारत लौट आये।



दिल्ली आकर उन्होने गोरखपुर के लिये बस पकड़ ली, निराशा के क्षणों में सफर वैसे भी लंबा हो जाता है, पूरा सफर उनके लिये बेहद कष्टकारक हो गया, उन्हे घर की याद आयी तो जैसे सांप सूंघ गया। वहां तो उनके पास कुछ भी नहीं था, सुषमा ने अपने पलको में यत्र तत्र बिखरी आंसुओं की बूंदों को तौलिये से पोंछते हुये कहा-



हमारी हालत तो ऐसे हो गयी, जैसे माया मिली ना राम ।


अब ज्यादा नहीं सोंचा करते, हर व्यक्ति को अपने किये का प्रायश्चित करना ही पड़ता है। हो सकता है, इसी में हमारा भला लिखा हो। संभव है हमारे किये के सारे पाप इसी से धुल गये हों और कल भोर की अरूणिम किरणें हमारे लिये नया सबेरा लेकर आये। सेठ महेशचंद्र ने अपनी ऐनक, आंखों से निकाल रूमाल एक सिरे से ग्लास पोंछते हुये कहा।

अब घर जाकर क्या करेंगे? क्या खायेंगे? क्या पीयेंगे? बेटे के पास नौकरी में साथ रहना भी अच्छा थोड़े ही होगा? इससे तो अच्छा है गोरखपुर से दूर किसी अन्जान शहर में रह जायें, घर बस तो बचा हुआ है, उसे किसी के पास बेच देते हैं- मधु ने उदास मन से कहा।


नहीं मध्ुा, अपना घर और अपना देश विपरीत परिस्थितियों में भी त्यागना नहीं चाहिये और जो ऐसा करते हैं वे तिरस्कार का कारण बनते हैं। जहां तक किसी के पास रहने का प्रश्न है, वह चाहे बेटा ही हो, मेरे उसुलों के खिलाफ है, मैं परबस जीवन नहीं जी सकता मधु, इससे अच्छा तो...।



क्या हुआ बहन, आप दोनों बहुत दुखी लगते हैं? समीप ही बगल में बैठी एक अधेड़ उम्र की स्त्री ने जब पूछा तो जैसे दोनो चैंक गये, वह बहुत देर से उनकी दुखभरी बातें सुन रही थी।



उसने तो जैसे मधु की दुखती नस पर हाथ रख दिया था, उसके सब्र का बांध एक ही झटके में टूट गया। सहानुभति वेदना की प्रेयसी होती है, इसके चंद मीठे लब्जों के समक्ष वेदना सदैव सहज समर्पण कर दिया करती है। वैसे भी स्त्री का मन जितना सहज और कोमल होता है, उसकी बर्दाश्त करने की सीमाएं उतनी ही उथली भी होती हैं। पल भर में ही अपनी आपबीती सहज रूप से मधु ने उस स्त्री के समक्ष उड़ेल कर रख दी ।



उनकी व्यथा सुन उस स्त्री की आंखों में आंसू छलक आये, वह भी अपनी पीड़ा बहुत देर तक भीतर रोक कर ना रख सकी, वह भी अपनी अपनी दुखभरी कहानी बखान करते हुये कहने लगीं- क्या करोगे बहन, नानक दुखिया सब संसारा। इस संसार में सब दुखी है, किसी को किसी बात का कष्ट तो किसी को किसी बात का क्षोभ। आप एक गर्भाधान के लिये तरस रही हैं और मेरे पास गर्भधारण के विकल्प हैं तो मै एक पति के लिये तरस रही हूं जो मुझे एक बार सुहागन बना दे ।



क्या कह रही हैं आप? क्या आपको आज तक कोई पुरूष नहीं मिला ? मधु ने आश्चर्य व्यक्त करते हुये कहा ?



नहीं ऐसा नहीं है, बहुत मिले पर... । पहले तो विवाह के बंधनों में बंधकर जीवन यापन करने जैसे बंदिशों से मुझे सख्त चिढ़ थी, सो... । खैर छोड़िये ...



बताईये ना...?



कुछ नहीं, डाॅक्टर ने अब कह दिया है कि मैं एक वर्ष से अधिक जीवित नहीं रह सकूंगी ।



क्यों...क्यों... क्यों?



कहा है, मुझे एड़स हो गया है, पर अब जैसे पुराने विचार मन में हिलोरे मार रही हैं, एक अंतिम इच्छा रह गयी है कि मांग में सिंदूर भरकर सुहागन की मौत मरूं । दादी कहा करती थीं जो स्त्री अविवाहित ही काल कलवित हो जाती हैं, वे पिशाचिनी हो जाती हैं। पर अब मुझसे भला कौन विवाह करेगा...हूं...।सब कुछ है, धन संपत्ति, ऐश्वर्य सब, पर कहने को पति नहीं, एक लंबी आह भरते हुये जब उस स्त्री ने अपना दुख मधु के समक्ष रखा तो उसे खुद की पीड़ा बहुत कम लगने लगी।



वाकई तुम्हारा दुख तो मुझसे भी ज्यादा है बहन... मधु ने लंबी सांस लेते हुये कहा।



मधु कुछ देर खयालों में खो गयी, वह सोंचने लगी कि इस स्त्री को आखिर मरना ही है तो काश ऐसा होता कि यह स्त्री मुझे एक बिटिया देकर इस दुनिया से विदा होती, यदि ऐसा होता तो कितना अच्छा होता, हमारी वह शर्त पूरी हो जाती और मुझे एक बहू मिल जाती। पर उससे विवाह कौन करेगा? उसके मन अंर्तद्वंद में उलझकर रह गये, क्षण भर को मन में विचार आये कि वह अपने पति के समक्ष ऐसा प्रस्ताव क्यों नहीं रखती? नहीं...नहीं यह तो पति की एक तरह से हत्या होगी, उसे भी एड़स हो गया तो...वह भी इस उम्र में... क्या होता है... अब वैसे भी हम दोनो नदी किनारे के दो वृक्षों की तरह ही तो हैं, कब बुलावा आ जाये और जाना पड़े क्या पता, आखिर हम दोनो कितना दिन और जीयेंगे पांच, दस, पंद्रह साल, इससे ज्यादा थोड़े ही... इसके बदले बेटे का जीवन भी तो संवर जायेगा, एक बहू मिल जायेगी, वंश को प्रवाह का आधार मिल जायेगा। एक बार पति के समक्ष प्रस्ताव रखने में क्या बुराई है...।नहीं.. नहीं अभी कहना ठीक नहीं होगा, वरना कुछ उल्टा पुल्टा कह दिया तो सफर में ही हंसी हो जायेगी। लेकिन यह महिला कहीं रास्ते में उतर गयी तो... यह स्त्री तो कहीं मना नहीं करेगी, नहीं... नहीं, यह तो किसी को भी विवाह करने को राजी है... यह मना नहीं करेगी... महेश के बस हां कहने की देर है...।



उसने धीरे से अपने पति के कान में यह प्रस्ताव रखा तो सेठ महेशचंद्र का माथा ठनक गया, वे भड़क गये, कहने लगे- तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है, सचमुच सठिया गयी हो। औरतों की बुद्धि तो वाकई पपीते के पेड़ की तरह होती है जो उम्रदराज होने पर उपर से तो ठीक-ठाक दिखायी देती है , पर अंदर से पोंगली हो जाती है।



अरे, बेटे की खातिर तो मैने बड़े-बड़ों को खुद की आहुति देते देखा है, बहुत सारे लोग बेटे की सरकारी नौकरी के लिये रिटायरमेंट से पहले ही फंदे को झूल लेते हैं और तुम हो एक ... मधु ने नाक सिकोड़ते हुये कहा।



स्त्री का स्वार्थ जब नकारात्मकता की सतह पर अंकुरित होती हो तो वाकई बड़ी खतरनाक हो जाती है, फिर वह अपने मंसूबों को पूरा करने के लिये या तो अपनी आहुति दे देती है या फिर आवश्यकता होने पर कईयों की बलि भी ले लेती है और जब पुत्रमोह का प्रश्न हो, फिर तो दुनिया के सारे अपराध उसे बौने लगने लगते हैं।



छी... तुम्हारी कितनी गंदी सोंच है...। नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता, सेठ महेशचंद्र ने संकोच मिश्रित गुस्से से कहा।



मधु, महेश को पूरे सफर के दौरान समझाती रही, उसे बताती रही कि उम्र के अंतिम पड़ाव में दो पुनीत कार्य एक साथ होने का किस तरह उसे पुण्य लाभ मिलेगा और किस तरह दो जिंदगियों को उनके ख्वाब को मूर्त रूप में परिणित करने का अवसर मिल सकेगा।किस तरह उनके रूपयों से हमारी गरीबी फिर से मिट जायेगी? क्या गरीबी और अपमान के सौ बरस से अच्छा अमीरी और सम्मान के कुछ पल नहीं होंगे। लेकिन पुरूष की समझ चाहे जितनी दूर तक जाती हो किंतु स्त्री के समक्ष आखिरकार वह हार ही जाती है। वरना यदि ऐसा ना होता तो दशरथ कैकेई की बातों में भला  अपनी समझ कैसे गवां बैठतेे ? मधु ने ना नुकुर करते अपने पति को आखिरकार बस के अंतिम पड़ाव तक मना ही लिया और उस स्त्री को लेकर घर आ गयी।



उस स्त्री को तो मधु ने पहले ही अपने उद्देश्यों के बारे में बता दिया था कि किन विवशताओं के चलते उसने यह कठिन समझौता किया है, किस तरह उसे वंश परंपरा की बांझ सोंच उसे डायन की भांति खाये जा रही है, कैसे भविष्य की शून्यता उसके चैन को बुरे स्वप्न के रूप में निगल रही है। चूंकि उस स्त्री की भी एक तरह से मुराद पूरी हो रही थी अतः वह भी बड़ी सरलता से स्वयं को उनके समक्ष समर्पित कर दी और तन-मन, धन सब कुछ समर्पण कर यहीं रहने लगी।

तीनों साथ-साथ रहते, कभी-कभी मधु को सौतियाडाह भी सालता, लेकिन पुत्रमोह ने उसे निष्ठुर और अंधा बना दिया था, एक बहू के लिये, बेटी की चाहत के उस शर्त को पूरा करने की धुन ने जैसे कुछ भी करने पर उसे आमादा कर दिया था, वह भले-बुरे की पहचान भूल सी गयी।



सौभाग्य से वह स्त्री एक महीने पश्चात ही गर्भवती हो गयी। मधु और महेश दोनो मिलकर उसकी खूब सेवा-जतन किया करते आखिर उस भ्रुण के रूप में उन्हे वंश का आधार जो प्राप्त होने वाला था। दोनों समय पर उसे दवाई पिलाते, हर माह की पहली तारीख को डाॅक्टर के पास ले जाते। कभी-कभी उन्हे डर सा लग जाता कि कहीं बच्चे को भी उसकी माता की तरह बीमारी लग गई तो सब कुछ गुड़ गोबर हो जायेगा, पर डाॅक्टरों ने उन्हे आश्वस्त कर दिया था कि सभी मामलों में ऐसा नहीं होता। ठीक नौ महीने पश्चात डाॅक्टर ने एक सफल शल्य चिकित्सा द्वारा उस नवजात शिशु को तो बाहर निकाल लिया, लेकिन उसकी माता को तमाम कोशिशों के बाद भी बचाया नहीं जा सका, उसके शरीर की सारी प्रतिरोधक क्षमतायें समाप्त हो चुकी थीं।



उस शिशु के आगमन से सबकी खुशी का ठिकाना ना रहा, यद्यपि चौथे माह में ही सभी ने होने वाले शिशु के बारे में जान लिया था किंतु इस तरह उसे पूर्ण स्वस्थ पाकर सभी प्रसन्नता से फूले नहीं समा रहे थे। पूरे घर भर की तपस्या एक तरह से सफल हो गयी थी। मधु की तो मानों मांगी मुराद पूरी हो गयी, घर पर जैसे बहार सी आ गयी। जिस घर के लिये बरसों से विहंगों का कलरव भी स्वप्न सा हो गया हो, उनके घर किसी बालिका का किलकारी भरा रूदन कितना सुकुन देती होगी, इसको तो वे ही समझ सकते थे। आखिर उन्होने उस शर्त को पूरा करने के लिये अपना घर-बार सब कुछ दांव पर जो लगा दिया था।उनका पश्चाताप आज उन्हे पूर्ण होता प्रतीत हो रहा था, शर्त के मुताबिक ठीक एक वर्ष पश्चात उस बालिका को गोयल परिवार को सौंप उन्हे अपनी बहू प्राप्त करना था।



सभी एक वर्ष व्यतीत हो जाने की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगे, इस बीच सेठ महेशचंद्र कुछ ही महीनों के अंतराल में लगातार सूखने लगे, उन्हे डर सा लगने लगा, डाॅक्टर से परीक्षण कराया तो उनका शक सही निकला, उसे भी एड्स हो गया था। किंतु अपनी बीमारी घर में बता घर की खुशियों को वह किसी भी हाल में कम नहीं करना चाहता था। आखिर उसे अपने बेटे को एक दुल्हे के रूप बहू की डोली खुशी-खुशी घर आते देखने की उत्कट लालसा जो थी।



आखिर एक वर्ष की अवधि भी जैसे-तैसे व्यतीत हो गयी, । घर में सभी बेहद खुश थे। बेटे पीयूष के चेहरे पर आज पहली बार मुस्कान थी, बरसों से प्रतीक्षित हाड़ में हल्दी चढ़ने का सुख निकट हो और किसी पुरूष या स्त्री के अधर मंद-मंद मधुरता लिये मुखरित ना हों यह भला कैसे संभव है? पूरे घर का प्रयत्न आज किसी परिणाम में परिवर्तित होने का दिवस था। तीनों उस शिशु को लेकर बड़े प्रफुल्लित मन से इलाहाबाद के लिये निकल पड़े । तंग गलियो से होकर जैसे ही गोयल परिवार के घर के निकट पहुंचे, सेठ महेशचंद्र की छाती खुशी से चैड़ी हो गयी।



घर की देहरी पर पहुंच सीढ़ियों के नीचे से ही सेठ महेशचंद्र ने दरवाजा खटखटाया । लड़की के पिता रमेशचंद्र गायेल ने जैसे ही दरवाजा खोला, दो वर्ष पहले की स्मृति मानस पटल पर कौंध गयी, वे भावविभोर हो गये ।उपर से ही उन्हे देख रमेशचंद्र गोयल प्रसन्नता से उनकी अगवानी में सपत्नीक दो सीढीयां नीचे तक उतर आये।



सेठ महेशचंद्र तो जैसे खुशी के मारे पागल हुये जा रहे थे, वे उस बालिका को दोनो हाथों में सामने की ओर लिये शीघ्रता से सीढ़ियां चढ़ते हुये आगे बढ़ने लगे। महज बीस सीढ़ियों का फासला ऐसा लगने लगा जैसे युगों का अंतराल उनके समक्ष दीवार बनकर खड़ी हो गयी है।चेहरे पर मादक मधुर मुस्कान लिये मधु हाथ जोड़े अभिवादन करते हुये आगे बढ़ रही थीं और पीछे-पीछे उनका बेटा पीयूष था।



तभी सेठ महेशचंद्र ने आगे बढ़ते हुये कहा- भाई साहब मैने आपकी शर्त पूरी कर दी है, अब मेरी बहू मुझे दे दीजीये, मैं आज सगाई की रस्म पूरी करने आया हूं।



अरे ! हां हां सेठजी मुझे अपनी शर्त अच्छी तरह याद है, आईये... आईये, मैं आपकी कब से प्रतीक्षा कर रहा था -रमेशचंद्र ने प्रफुल्लित होते हुये कहा।



ये लीजीय आपकी शर्त... आपकी अमानत ... ऐसा कहते हुये सेठ महेशचंद्र गुप्ता ने जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया, उनका दाहिना पैर सीढ़ी के किनारे हिस्से पर पड़ा और असंतुलित होकर एक ही क्षण में सीढ़ीयंो से उस बच्ची के साथ लुढ़कते हुये औंधे मुंह सिर के बल जा गिरे । पूरा फर्श खूनी जिस्म से लथपथ तरबतर हो गया था । क्षण भर को तो पूरा वातावरण शांत हो गया, चारों किसी पाषाण प्रतिमा की तरह किंकर्तवयविमूढ़ से हो गये, उन्हे कुछ भी सूझ नहीं रहा था, जिंदगी कुछ क्षणो के लिये तो जैसे ठहर सी गयी। सभी उनकी ओर दौड़ पड़े, सेठ महेशचंद्र के सुन्न शरीर को तो  दूर से ही देखकर आभास हाने लगा था कि उनके प्राण पखेरू उड़ चुके हैं, सब के सब दूर छिटकी हुई उस बालिका की ओर दौड़े, तभी एकाएक मधु के मंूह से निकल पड़ा- हे ईश्वर  पके हुये गेहूं की बालियों में ये कैसे ओले पड़ गये, आखिर यह तेरा कैसा क्रुर  मजाक है? वह शिशु भी उसी क्षण इस संसार से अपने पिता के साथ महाप्रयाण कर चुकी थी।





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सोमवार, 2 नवम्बर 2009

कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता...(कविता).

कुछ तो वजहें होंगी, कुछ तो अफसाने होंगे ।
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान ।


निश्चय ही धरती के भीतर,
कुछ तो उथल-पुथल होती होंगी ।
भावनाओं के कोमल सतह पर,
कठोर चट्टानों का आधात होता होगा।
कभी भूचाल आते होंगे,
कभी अंदर का लावा पिघलकर,
कलम के सहारे शब्दों का शक्ल लेता होगा ।
सारी वेदनायें अक्षरों में सिमट जाती होंगी,
और बनती होंगी, झकझोर देने वाली कविता ।

कोई तो है, जिसके कटु वचनों से आहत होता होगा हर रोज तुम्हारा मान,
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता, इस तरह मातमी गान ।


पर्वतों सा मुकुट पर तेरे,
किसी सिरफिरे का शत बार प्रहार होता होगा ।
तुम्हारे केशुओं सा फैली घनी चोंटियों की श्रृंखला में,
किसी मदभरे गज का भीतर तक संघात होता होगा।
टूटती होंगी शिखर छूती टहनियां,
उजड़ती होंगी भीतर कलरव करती खग सी ख्वाईशो के घोसले।
पनाहों के लिये भटकती होंगी,
तुम्हारे भीतर का अंर्तद्वंद ।
और तब टूटती होगी मर्यादा कलम की,
टूटता होगा शब्दों का वह सम्मान ।

पता नहीं क्यों?
जब-जब पढ़ा करता तुम्हे, तब-तब होता ऐसा ही कुछ भान ।
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान।


कोई तुझे अपनी तप्त रश्मियों से दग्ध कर,
कुरेदता होगा रसातल तक ।
तुम्हारे हिमशिखर सा पाषाण इरादे पिघलते होंगे ।
और चक्षु संबंधों का विस्तार पाती होंगी अधर तक ।
बहती होगी सरिता,
समस्त वेदनाओं के करकटों को स्वयं में समेटकर ।
सागर सा धैर्य, मुख का तुम्हारा,
विचलित होता होगा क्षण भर को ।
हृदय में उठती होंगी विशालकाय लहरें ।
डूबती होंगी तटें ना जाने कितनी,
कितनी अभिलाषाएं मृतप्राय सी होती होंगी सतह पर ।
और तब कहीं कागजों पर रेखांकित होती होगी, एक नारी का चोटिल स्वाभिमान ।


ना जाने क्यों ? तुम्हारे शब्दों में छिपी इन्ही वेदनाओं को देख ,
हर रोज टूटा करता, मेरे पुरूष होने का अभिमान ।
सच कहता हूं, कुछ तो जरूर है,
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान ।

मंगलवार, 16 जून 2009

उपेक्षा

रामधीन बूढ़ा हो चुका था, अस्सी साल की उम्र में वैसे तो नाती पोतों से भरा पूरा परिवार था लेकिन कहने को उनमें से कोई भी अपना नहीं था, वैसे भी जब शरीर के अपने ही अंगों ने साथ छोड़ दिया तब भला परिवार और पड़ोस से क्या उम्मीद ? दांतों ने साथ छोड़ा तो जिव्हा भूने हुये गरम-गरम चने के स्वाद के लिये तरस गयी, कभी मन किया और पोतों से चने पीसकर खिलाने की ख्वाईश कर बैठा तो मानों आफत आ जाती, बहुओं की कड़वी जुबान से गरम-गरम मीठे चने का स्वाद भी जैसे कड़वा हो जाता । उलाहना देते हुये पोतों से कहतीं- साठ से उपर के हो गये, पर जिव्हा तो ऐसे जवान है जैसे कोई नयी नवेली दुल्हन गर्भवती हो गयी हो, तेरे दादू तो दरिद्र हैं, चाहे जितना खिलाओ कभी जी ही नहीं भरता । कब्र पर पांव लटके हुये हैं पर इनकी जीभ तो दिन ब दिन जवान होते जा रही है। रामभजन तो दूर की बात कभी बच्चों को किताब खोलकर पढ़ा दें ऐसा भी नहीं होता । सामने दालान पर गेंहूं सूख रहा है, चिड़िया इधर-उधर फुदक्के मारकर गेंहूं जमीन पर गिरा रही है, पर मजाल है जनाब अपनी जगह से अखबार समेट कभी टस से मस भी हो जायें, कुछ कह दो तो ऐसे मुंह फुला लेते हैं जैसे किसी ने इन्हे घर से निकालने को कह दिया हो।


जवानी में पूरे महकमें में अपनी हुकुम चलाने वाले रामधीन की हालत अपने ही घर में बहुओं के सामने मिमियायी बिल्ली सी हो गयी थी। बेटे मुसकुण्डे जवान थे पर मजाल है रामधीन को कोसती हुई अपनी लुगाई की तलवार की धार सी चमचमाती जिव्हा पर जरा सा भी नियंत्रण रख पाये । कभी टोकने की कोशिश की तो बेटे और बहू के बीच बातचीत का माध्यम वो नन्हा सा पोता हो जाता। ले देकर मनाने पथाने पर जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आती तो दोनो मिलकर रामधीन को खूब कोसते, बड़ी बहू उलाहना देते हुये कहती - ये खूसट बुढ़उ, जब तक रहेगा हम दोनों के बीच इसी तरह खिचिर पिचिर होती रहेगी । अच्छा खासा गांव में पड़ा था, बेकार आने को कह दिया ?एक बार तुमने कह क्या दिया सही में चला आया, एक बार तो सोच लिया होता , मगर दिमाग तो सठिया गया है ना, अब इस उम्र में कहा भला इतनी बुद्धि? ।

रामधीन को अपने बड़े बेटे के घर आये हफ्ते भर ही हुये थे कि अब जी भर गया, वह खुद को कोसता, कि कहां बेकार चले आये, उससे तो अच्छा था गांव के घर में अपने ही हाथ से अंगीठी पर सिंकी हुई जली रोटियों का स्वाद लेकर जैसे तैसे गुजर करते । आखिर इतने सालों से रूखी- सूखी खाकर गुजर तो चल रहा था ना ? लेकिन जिस तरह जवानी में मन पर नियंत्रण नहीं होता उसी तरह बुढ़ापे में चटकारें मारती हुई जीभ पर जितनी बंदिशें लगाओ कमबख्त उतनी ही दगा दे जाती है । अच्छे पकवान की लालसा लिये रामधीन जब घर से निकला तभी मन में आशंका थी कि कहीं बहुयें अनाप-शनाप कहने लगीं तो क्या होगा? लेकिन इंद्रियों का आवेग स्वाभिमान की दीवारों को नेस्तनाबूत कर देता है । क्षणिक सुख की लालसा में कहां किसी इज्जत की चाह और कहां स्वाभिमान को चोंट पहुचने का डर ।

लेकिन अब रामधीन का मन पूरी तरह भर गया था वह अपने गांव लौट जाना चाहता था । बहू से घर लौटने की इच्छा जाहिर की तो हफ्ते भर से मुरझाये चेहरे पर जैसे चमक आ गयी, फुदकते हुये कहने लगी - हां बाबूजी, मैं भी इनके पापा से कल ही कह रही थी, खेती बाड़ी के दिन आ गये, ऐसे में नौकरों के भरोसे बैठे रहने से तो काम नहीं चलेगा ना ? कल सुबह वाली ट्रेन सुपरफास्ट है ज्यादा जगहों पर नहीं रूकती, सीधे लखनउ से बनारस को जाती है । आप कहें तो मैं घर बैठे ही रिजर्वेशन के टिकट निकाल दूं। आजकल न स्टेशन पर टिकट के लिये जाने की झंझट और न ही किसी से कुछ कहने की जरूरत, हां बाबूजी, एक बटन क्लिक करते ही घर में टिकट निकल आता है ।

जाते वक्त सुबह बेटा स्टेशन तक छोड़ने आया और जेब से पचास रूपये के नोट निकालते हुये कहा- बाबूजी, ये रख लो, रास्ते में काम आयेगा । रामधीन पसीने से भीगे हुये पुराने नोटं को देखकर गुस्से से आग बबूला हो रहा था, कभी वह अपने बेटे मनोज के चेहरे को देखता तो कभी मुड़ी हुई बीच से फटी नोट को देख गुस्से से लाल-पीला होता । जी में आ रहा था कि कह दे ,बेटा साठ रूपये की टिकट तो बनारस से गांव तक बस में जाने की लगती है, उससे तो बेहतर है कि तुम इसे अपने पास रख लो, लेकिन वह कुछ कहता इसके पहले ही बेटे ने मुरझाये चेहरे से नीची नजरें करते हुये कहा- बाबूजी, महंगाई बहुत है, घर के खर्च बमुश्किल से चल पाते हैं ।


रामधीन ने गुस्से से कहा- बेटा, महंगाई तो उस समय भी थी जब तेरे बाप को तीन सौ रूपये की तनख्वाह मिला करती और उसमें से ढाई सौ रूपये तुम दोनों बेटों की पढ़ाई में खर्च हो जाते। हर हफ्ते तुम्हारी चिट्ठियों पर हालचाल कम रूपयों की फरमाईश ज्यादा होती । तू जब कभी सौ रूपयों की डिमांड करता तो तेरा बाप तुझे दो सौ रूपये मनिआर्डर भेजा करता, खैर... ।

अभी रामधीन की बातें पूरी भी नहीं हुई थी कि ट्रेन चलने लगी और बेटा जल्दी-जल्दी पिता को विदा कर चलती ट्रेन से उतर गया । गांव के सरहद पर पहुंचकर रामधीन को थोड़ा सुकुन मिला। अब फिर से वही दिनचर्या, वही माटी का चूल्हा , धुंओं के बीच मीचती हुई बूढ़ी आंखें और उन घने धुंओं के बीच खांसता हुआ बुढ़ापा, बस यही तो छोटी सी जिंदगी है। मन किया तो कुछ बना लिया नही तो सुबह की रूखी-सूखी खाकर ही सो गये। लेकिन पूरा बुढ़ापा इस तरह तो नहीं कट सकता था। अनियमित खानपान और पेट की क्षुधा को ढीले होते हाथ पैर का हवाला देकर शरीर को बहुत दिनों तक आखिर कैसे तंदरूस्त रखा जा सकता था ? कुछ दिनों में ही रामधीन की तबियत फिर से खराब हो गयी, मन किया इस बार छोटे बेटे के यहां जाकर इलाज कराया जावे और पेट की बरसों से धधक रही चिंगारी को शांत किया जाये पर छोटी बहू की याद आते ही मन मसोसकर रह गया । छोटी बहू तो जैसे ज्वालामुखी है, बोलती है तो लगता है मानों अंगारे बरस रहे हों।

रामधीन की बिगड़ती हालत को देखकर पड़ोसियों ने दोनों बेटों को इत्तला करने की कोशिश की लेकिन अपने -अपने परिवार में मगन बेटों को भला इसकी क्या परवाह? बड़े बेटे के मन में पिता को देखने की थोड़ी इच्छा हुई भी तो पत्नी की खरी खोटी सुनकर गांव जाने की हिम्मत ही नहीं हुई। भुनभुनाते हुये कहने लगीं- पिछली बार पूरे एक हफ्ते की छुट्टी खराब करके आये थे, कुछ मिला? अरे बाबूजी को कुछ हो गया तो पड़ोसी तो मर नहीं गये हैं?जरूर खबर भिजवायेंगे। अब आज के जमाने में कोई ऐसे पुण्यात्मा तो बचे नहीं हैं कि तुम्हे खबर ना लगे और बाप की अर्थी का इंतजाम हो जाये । कितनी बार कहा है धर्मात्मा मत बनों, दुनिया को देखकर सीखो, सारे लोग स्वार्थी हैं किसी को किसी की परवाह नहीं है, अरे और कोई नही तो तुम्हारी खेती बाड़ी करने वाला नौकर तो जिंदा है । पिछली बार कितनी दफा मना किया होगा, लेकिन तुम्हारा तो प्यार जैसे छाती से छलकता है, अभी गर्मी में शिमला जाने का प्लान है, सब छुट्टियां ऐसे ही खत्म कर दोगे तो बच्चों को क्या खाक घुमाओगे?


पड़ोसियों ने इधर-उधर से दवाई के इंतजाम किये लेकिन पेट की आग से झुलसी सिकुड़ी हुई आंतों की कमजोरियों को गोलियां भला कब तक दूर कर पाती? हालत दिन ब दिन बिगड़ती गयी, और अब तो गांव के रिश्तेदारों को लगने लगा कि बेटे तभी आयेंगे जब बाप के अंतिम दर्शन की उनके अंदर अभिलाषा बची हो। बेटों को फिर से खबर की गयी कि यदि उन्हे पिता के अंतिम दर्शन करने हैं तो वे तुरंत सुबह की गाड़ी से ही चले आयें। खबर पाते ही दोनो बेटे भोर में आ गये, इस बार वे पूरी तैयारी के साथ आये थे, बहुओं के चेहरे पर अजीब सी चमक थी, मन में कहीं ना कहीं इस बात की खुशी थी कि चलो इस बुढ़उ के झंझट से हमेशा के लिये मुक्ति मिलेगी। रोज-रोज का वही नाटक, कभी बुखार तो कभी खांसी, कभी पेट दर्द तो कभी बदन में सूजन। बूढ़ा आदमी घर में क्या हुआ मानों आफत ही आफत, कभी सुकुन से रहने को नहीं मिलता, मशीन सी जिंदगी में बुढ़ापा कचरे की तरह घुसकर पूरी दिनचर्या को जैसे जाम कर देती है।


घर पहुंचते ही अच्छी भली चंगी, रास्ते भर फुदक-फुदक कर खाते पीते आयी बहुओं के चेहरे शोक संतप्त हो गये, आंखें सूर्ख लाल हो गयीं, आंसुओं की धार सहयाद्रि पर्वत से निकली किसी सरिता की तरह प्रवाहमान होकर आंचल को गीली करने लगी। दोनों बहुयें ऐसे रो रही थीं जैसे उनके सर से किसी देवता की छत्रछाया छीन गयी हो। सब कुछ दिखावटी था लेकिन इस बनावटीपन में भी विशिष्टता थी, आखिर आज की व्यस्त जिंदगी में कहां इतनी फुर्सत थी कि देर तक किसी एक ही भूमिका का निर्वाह करते हुये बैठे रहा जाये, आज मनुष्य की जिंदगी भी तो रंगमंच के एक पात्र की तरह हो गयी है जहां ढेर सारी भूमिकाओं का निर्वहन एक व्यक्ति को एक ही समय पर करना होता है, सो समय पड़ा तो रो लिये और मन हुआ तो थोड़ी देर में ही किसी रेस्टोरेंट में बैठकर आइसक्रीम का लुत्फ उठा लिये।


आस पड़ोस के लोग जानते थे कि दोनों बहुओं की आंखों से जितने लोटे भर आंसू दहाड़ मार-मारकर गिर रहे है, उतने लोटे भर पानी तो इन्होने ब्याह के दिन से अब तक मिलाकर भी कभी ससुर को पानी नहीं पिलायी होगी। लेकिन वो जमाना कहां रहा, अब तो कहां बुजुर्गों की परवाह और कहां लोकलाज का भय। किसी ने कुछ कहा, तो कह दिया कि तुम्हारी तरह बैठे ठाले नहीं हैं, गांव की जिंदगी और पशुओ के घुमंतु फक्कड़पन में कोई अंतर थोडे ही होता है, शहर जाकर देखो, चौबीस घण्टे भी कम पड़ते हैं।


रामधीन खाट पर लस्त पड़ा हुआ था, यद्यपि वह बोल नहीं पा रहा था, लेकिन सब कुछ सुन और समझ पा रहा था । वह बुढ़ापे की पीड़ा को बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा था, वह मन ही मन विचार कर रहा था कि किस तरह चौथेपन की अवस्था रास्ते में पड़े पत्थर की मानिंद अस्तित्वविहीन हो जाती है, अपने पराये हो जाते हैं और खून के रिश्ते कन्नी काटने लगते हैं। जिसके मन में जो आया कहकर निकल गया । जिंदगी भर ठोकरें खाकर अनुभव इकट्ठी की, पर किसी को कहां इतना वक्त कि तनिक बैठकर पूछ लें, थोड़ी राय लें लें, पड़ोसी तो गैर हुये अपनों को भी बिन मांगे नसीहतें दो तो ऐसे घुड़कते हैं, जैसे दुनिया भर के पाण्डित्य और नीति शास्त्र में शोध कर लिया हो । कुछ कहने का शुरू करो इसके पहले ही एक ही वाक्य में पूरी बात कैंची की तरह कतर देते हैं, कहे देते हैं, बाबूजी आप नहीं समझ पाओगे । अरे! जिन औलादों को पाला पोंसा बोलना, चलना,हंसना और समाज में उठना-बैठना सिखाया वे ही जब कहते हैं कि ये बस का नही ंतो मन करता है खींचकर तमाचे जड़ दूं, पर मन की पीड़ा मन में दबा कर रखने में ही बुढ़ापे में भलाई है। रामधीन मन ही मन बुदबुदाते हुये सोंच रहा था, सचमुच बुढ़ापा नरक का प्रवेश द्वार है, नरक के सारे रास्ते बस यहीं से होकर जाते हैं। ना शरीर में वो ताकत और ना घर में दो कौड़ी की कीमत। स्वाभिमान को दीवार में लगी खूंटी में टांगकर बची खुची जिंदगी घुट-घुटकर जी लो, नहीं तो मौत तो दोस्ती के लिये किनारे खड़ी ही होती है। वह सोंच रहा था कि कैसे एक पिता उन्ही बच्चों के जन्म पर बाजे-गाजे बजवा खुशियाँ मनाता है, मिठाईयां बांटता है, लोंगों के सामने इतराते हुये बांहों के झूले बना नाच-नाचकर सबको दिखाता है कि देखो ये मेरा बेटा है, बड़ा होकर मेरा नाम रोशन करेगा और वही बेटे जब जवान होकर दुलत्ती मारते हैं तो एक बूढ़े पिता को कितना दुख होता होगा? आज वह उस पीड़ा को महसूस कर रहा था । उसे इस बात का भी अहसास हो रहा था कि एक पिता अपने सभी संतानों की हर ख्वाईश , हर जिद्द अपनी हैसियत से आगे बढ़कर पूरा करता है, पर सभी संतान मिलकर एक पिता की न्यूनतम आवश्यकता की भी पूर्ति नहीं कर पाते।रामधीन कभी बुढ़ापे की अपनी अवस्था को कोसता तो कभी बदली हुई परिस्थितियों को जी भरकर गालियां देता।


रामधीन के खाट के चारों ओर शोक का माहौल था। बेटे मंुह लटकाए हुये खड़े थे, बिस्तर पर पड़े रामधीन को देखने आने जाने वालों पड़ोसियों का सिलसिला थम नहीं रहा था,सभी से बड़ा बेटा ही मिल रहा था, कह रहा था- बस चाचा, अंतिम समय है, चलो अच्छा है, ज्यादा सेवा नहीं कराये वरना खाट पर महीनों पचते तो कहां इतनी फुर्सत थी कि हम नौकरी भी देखें और इधर भी। छोटा बेटा दही और गंगा जल हाथ में लेकर बड़े भाई से कह रहा था -भैया, इसमें तुलसी की पत्तियां मिलाकर जल्दी पिला दें वरना कहीं ऐसा ना हो कि बिना दही और गंगा जल लिये बाबूजी के प्राण छूट जायें । जब दोनो ने मिलकर पिता को खाट से जमीन पर लिटाया तो बहुएं बिलख-बिलखकर रोने लगीं , उनके विलाप को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे रामधीन स्वर्ग सिधार गया हो। इसी बीच छोटी बहू एक मरही सी पतली दुबली बछिया को खींचते हुये रामधीन तक लाने का प्रयास करते हुये अपने पति से कहने लगी - अजी सुनते हो! बाबूजी को बछिया के पूंछ छुआ दो, बैतरणी पार करने में मदद मिलेगी, वह बछिया को बड़ी ताकत से खींच रही थी, लेकिन बछिया थी कि अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रही थी,बड़ी बहू ने मदद करने की कोशिश करते हुये बछिया को थोड़ा धक्का क्या दी, बछिया वहीं धड़ाम से गिर गयी और एक ही झटके में दम तोड़ दी । रामधीन यह सब बड़े इत्मीनान से देख रहा था । जिंदगी भर पाई-पाई जोड़ अपने बेटों के लिये महल खड़ा करने वाले रामधीन को जीते जी ना तो पेट भर खाना नसीब हो सका और ना मरते समय भली चंगी बछिया के पूंछ की कोई आस दिखायी दे रही थी।


घर में पूरा माहौल गमगीन था, सुबह से ही भजन कीर्तन कराये जा रहे थे, पंडित मनसुख को भोर में ही गीता सुनाने के लिये बुला लिया गया था और कह दिया गया था कि बाबूजी के प्राण छूटते तक लगातार गीता पाठ का क्रम चलता रहे, पंडित मनसुख श्लोको का भावार्थ बताते हुये रामधीन को मृत्यु के भय से निजात दिलाने का प्रयत्न करते हुये कह रहे थे, कि मृत्यु शोक का विषय नहीं है, और ना ही इससे किंचित मात्र भी भय की आवश्यकता है। वे कह रहे थे, जैसे मनुष्य पुराने कपड़ों को त्यागकर नये कपड़े धारण करता है, वैसे ही यह आत्मा भी पुराने शरीर को त्यागकर नये शरीर धारण करती है।
सुबह से ही बड़े बेटे ने दो पहलवान से दिखने वाले हट्टे कट्टे जवान मजदूरों को कंधा देने के लिये मजदूरी पर बुला लिया था, बांस की लकड़ी से चिता बना ली गयी थी, बड़ा बेटा चिता को उलट पलट कर देखते हुये कह रहा था कि जरा बीच में एक लकड़ी और डाल दो, बाबूजी थोड़े हट्टे कट्टे हैं। कफन के कपड़े पहले ही रामधीन के सिरहाने पर रखी हुई थी ।


बड़ा बेटा पिता के पास बैठकर अपने भाई के साथ पूरे तेरह दिन तक आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार कर रहा था। छोटू की शादी के बाद एक अर्से से घर में कोई समारोह भी तो आयोजित नहीं हुये थे, इस बीच परिस्थितियां कितनी बदल गयीं पर अपनी भव्यता दिखाने का कोई अवसर ही हाथ नहीं आया था, सो इस बार वे बता देना चाहते थे कि उनकी हैसियत गांव में किसी से कम नहीं है । टेंट के आर्डर पहले ही दे दिये गये थे । हलवाई को पास बिठाकर पूरे तेरह दिन के मीनू के बारे में समझाया जा रहा था।बड़ा बेटा मनोज हलवाई को समझाते हुये कह रहा था - खानपान में किसी प्रकार की कोई कमीं ना रहे, अभी नौ दिन तक तो केवल खिचड़ी ही बनानी होगी, रिवाज है, आखिर पालन तो करना होगा ना, लेकिन खिचड़ी भी मूंगदाल मिलाकर तीन तरह की होगी। साथ ही यह बात भी ध्यान रखना होगा कि जो खिचड़ी नहीं खाना चाहते उनके लिये विकल्प के तौर पर छोले, पूड़ी, गाजर का हलवा और दाल चांवल की भी व्यवस्था हो । कहीं ऐसा ना हो कि रिवाज के चक्कर में एकाध को अस्पताल ले जाना पडे़ और लेने के देने पड़ जायें। दसवें दिन और तेरहवें दिन के लिये विषेश व्यवस्था रहेगी। मीठे में छः प्रकार के आईटम होंगे - गुलाब जामुन, मूंग का हलवा, काजू की बरफी, इमरती और खीर के साथ ही छः प्रकार की सब्जियां होंगी । सब्जियों में पालक पनीर और कोफते की सब्जी अनिवार्य रूप से हाने चाहिये,ये बाबूजी को बहुत पसंद थे। मुझे अच्छी तरह याद है जब हम जब छोटे थे, तब बाबूजी तनख्वाह मिलने पर हर महीने की पहली तारीख को हमें रेस्टोरेंट जरूर ले जाया करते थे । अच्छा, हां खाने में पूड़ी के साथ जीरा फ्राई चांवल और पुलाव जरूर होने चाहिये । तेरह ब्राह्मणों के लिये लिये विषेश व्यवस्था होगी, उन्हे मोहनभोग और रसमलाई अतिरिक्त रूप से परोसे जायेंगे। फल में आम, सेब और अंगूर जरूर होंगे,भले ही अभी आम की सीजन नहीं है पर चाहे जितने महंगे मिलें पर्याप्त मात्रा में परोसे जायें, पैसे की कोई चिंता नहीं है। आसपास के सारे भिखारियों को भरपेट भोजन कराये जायें ताकि बाबूजी की आत्मा को पूरी तरह शान्ति मिल जाये।


रामधीन जमीन पर लेटे हुये अपने बेटे की बात बड़े गौर से सुन रहा था। इतनी सारी खाने की चीजों के नाम सुनते ही मुह में पानी आने लगा, बरसों से जीभ इन पकवानों के स्वाद के लिये जैसे तरस सी गयी थी, आंते भूख में अकुला कर पूरे चार इंच सिकुड़ गयी थी । थोड़ी देर के लिये मन में विचार आया कि कह दे, बेटा मेरी तेरहवीं जीते जी क्यों नहीं कर देते ? मैं भी छककर खा लेता और जीते जी ही मेरी आत्मा को शान्ति मिल जाती। सूखी लकड़ी की तरह सूख चुके इस हड्डी के ढांचे में फिर से एक नयी जान आ जाती और दो चार साल इस दुनिया को थोड़ा और देख लेता । पर मन की बात जुबां तक आयी भी तो बोलने की हिम्मत ही कहां थी? ले-देकर हिम्मत जुटा इशारो से कुछ बोलने की कोशिश की भी तो छोटी बहू ने तपाक से गिलास मुह में ठुंसते हुये वहंा बैठे लोगों पर बिफर पड़ी, कहने लगी- अरे!सब कितने निर्दयी हो, बाबूजी जब से पानी मांग रहे हैं पर सब अपने-अपने में मगन हैं किसी को परवाह नहीं है, रामधीन इधर-उधर मुंह बिदकाता रहा पर छोटी बहू ने पानी पिलाकर ही दम लिया । खुद पर इतराते हुये अपने पति से कान पर कहने लगी - अजी, आपने देखा मैं कितनी पुण्यात्मा हूं, तभी तो बाबूजी को अंतिम बार पानी पिलाने का सौभाग्य मुझे मिला है । पर रामधीन तो सिर्फ उन लजीज पकवानों के स्वाद को महसूस करता हुआ उन क्षणों की यादों में खोया हुआ था, जब रिटायरमेंट पर उसे एक शानदार पार्टी दी गयी थी । बड़े -बड़े तीन रसगुल्ले खाये थे। बोस ने कितनी बार कहा होगा दो और खा लो पर जैसे उस दिन हिम्मत ही नहीं हुई । रसगुल्लों की याद आते ही मुंह से लार बहने लगा।

बड़ी बहू वहीं पास में सिरहाने पर बैठी कफन की लंबाई- चौडाई नाप रही थी। कभी वह रामधीन को अपने हाथ की लंबाई से नापती तो कभी कफन को बित्ते से, देख रही थी कि कहीं से छोटा ना पड़ जाये। मुंह से लार बहता देख छोटी बहू से कहने लगी - छुटकी, बाबूजी के मुंह से तो अब लार बहने लगा है। कहते हैं जब अंत समय निकट होता है तो मुंह से लार बहता है, कभी-कभी झाग भी आने लगता है। छुटकी, तुम देर मत करो , जाओ और जल्दी से कंडे सुलगा लो, हवन में जरूरत पड़ेगी और हां पिण्डदान के लिये थाली में पूरे सामान तैयार कर लो।


लेकिन छोटी बहू, जेठानी की बातों में कम अपने जेठ की योजनाओं के खाके तैयार करने पर ज्यादा लगी हुई थी। वह देख रही थी कि पंडितजी को दिये जाने वाले दक्षिणा के बारे में बहस चल रही है, वह भी उस बहस में कूद पड़ी । तू-तू, मैं-में होने लगी, वह इस बात पर अड़ गयी कि पंडित जी को दक्षिणा में सोने की अंगूठी देने की कोई आवश्यकता नहीं है, केवल चांदी के चम्मच से काम चल जायेगा । पास में गीता सुनाते बैठे पंडित जी का ध्यान दक्षिणा के बारे में होते बहस को देखकर बंटने लगा, सारे श्लोक उल्टे -पुल्टे होने लगे, भावार्थ बताते हुये अर्थ का अनर्थ कहने लगे । एक श्लोक का अर्थ बताते हुये कहने लगे- जीवन एक शाश्वत सत्य है, मरने के बाद भला किसने देखा है कि अगला जन्म होगा या नहीं, इसलिए समस्त भोग विलास इस जन्म में ही मृत्यु के पूर्व कर लेने चाहिये । पास बैठे शोकमग्न पड़ोसी पंडित मनसुख के भावार्थसे भौंचक्के रह गये, वे कुछ टोका-टाकी करते इसके पहले ही पंडित जी गीता बंद कर उस बहस में कुदते हुये कहने लगे- देखिये भाई साहब , ऐसे काम नहीं चलेगा, मृत्युकर्म के समय दान में सोना देना अनिवार्य होता है , यही नहीं बल्कि रिवाज तो यह भी है कि व्यक्ति मृत्यु के समय जो आभूषण पहने होता है उस पर भी पुरोहित का अधिकार होता है, उसे किसी भी प्रकार से घर में पुनः रखना शास्त्रों में निषिद्ध और पापकर्म माना गया है ।


इतना सुनना था कि बहुओं के कान खड़े हो गये, उनका ध्यान झट उन आभूषणों की ओर चला गया, जो रामधीन उस समय पहने हुआ था। उसके गले में सोने की एक चेन और हाथ में दो अंगूठी थी। एक अंगूठी सगाई के वक्त की थी ओर चेन भी शादी के वक्त सास ने पहनायी थी, पूरे चालीस साल हो गये थे, इस बीच जिंदगी में कितने उतार चढ़ाव आये पर क्षण भर के लिये भी इन आभूषणों को उसने खुद से अलग नहीं होने दिया । एक अंगूठी रिटायरमेंट के समय स्टाॅफ के लोगों ने बतौर निशानी बड़े सम्मान के साथ पहनायी थी । दोनो बहुंये उन अंगूठियों को निकालने में भिड़ गयीं, रामधीन हाथ इधर-उधर हाथ हिलाता, झटकारता हुआ ना-नुकुर करता रहा पर बहुओं को ससुर की उन भावनाओं की भला क्या परवाह। एक अंगूठी जो सगाई के समय की थी निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी, तभी छोटी बहू ने कैंची लाकर अंगूठी काट डाली और ऐसा करते हुये रामधीन के हाथ की चमड़ी थोड़ी सी कट गई, बहू ने रसोई से हल्दी लाकर कटी जगह पर मल दिया और जाते-जाते सोने का चेन भी निकाल ले गयीं ।


सब रामधीन के समीप बैठे हुये उसके मौत की प्रतीक्षा कर रहे थे, शाम होने को आयी, पड़ोसी उठ-उठकर घर को जाने लगे, पंडितजी का मन भी बिदकने लगा था। उसने अपनी पोथी पत्रा बंद करते हुये कहा- भाईसाहब मैं थक गया, पूरी गीता तीन बार सुना डाला पर इनकी आत्मा तो जैसे कहीं अटकी हुई है, निकलने का नाम ही नहीं लेती । बहुओं ने लाख मिन्नतें की पर पर पंडित जी कहां मानने वाले थे, छुटकी ने कहा- पंडित जी, थोड़ी देर और देख लीजीये, शायद कुछ ही देर में प्राण निकल जाये पर पंडित जी क्षण भर रूकने को तैयार नहीं थे । उन्होने अपनी दक्षिणा मांगनी शुरू की तो बड़ी बहू ने एक सौ एक रूपये हाथ पर धरते हुये कहा- पंडित जी कल फिर सुबह से आईयेगा। पंडितजी सौ का नोट हाथ पर देख गुस्से से उबल पड़े, नोट को बड़े बेटे की ओर फेंकते हुये कहा- अरे!क्या आप लोग पुरोहिती को मजदूरी समझ रखे हैं?तीन-तीन जगहो पर पूजा थी, दो हजार रूपये से कम नहीं मिलते पर आपके कारण मैने सब छोड़ दिया, अरे चलो किसी की आत्मा को शांति मिल जाये पर सचमुच जमाना भलाई का नहीं है, होम करो तो हाथ जलते हैं। पूरे एक हजार दीजीये, नही ंतो मैं यहां से टस से मस नहीं होउंगा, गुस्से से तिलमिलाये पंडित जी वहीं कुण्डली मारकर बैठ गये।


छोटी बहू गुस्से से फुफकारने लगी- पंडित जी, एक हजार कोई छोटा-मोटा अमाउन्ट नहीं होता, बाबूजी के फेमिली पेन्शन की महीने भर की रकम पूरे हजार रूपये होते हैं । मै सुबह से शाम तक आॅफिस में काम करती हूं, तब बड़ी मुश्किल से हजार रूपये मिलते हैं। यदि ऐसे पैसे मिलने लगे तो आदमी शहर जाकर माथापच्ची क्यों करेगा, गांव में पुराहिती ही नहीं कर लेगा ? ये लीजीये दो सौ इंक्यावन रू. कल से आपको आने की जरूरत नहीं है, हम खुद ही गीता पाठ कर लेंगे। संस्कृत हमें भी आती है ।


सबके जाने के बाद रात में बड़ी बहू ने घर में पंचायत बुला ली, इस बात पर लंबे चैड़े विचार विमर्श होने लगे कि आखिर बाबूजी की आत्मा अधर में क्यों अटकी हुई है, कहीं कुछ आखिरी ख्वाईश तो नहीं, जो बची रह गयीहो।सबने मिलकर बीते दिनों की बातों को याद करने की कोशिश की लेकिन वे किसी परिणाम पर नहीं पहंुच सके । छोटी बहू ने सुझाव देते हुये कहा- दीदी, गांवों में काला जादू बहुत चलता है, कहीं किसी डायन औरत ने बाबूजी की आत्मा को बांध तो नहीं दिया है? क्यों ना ओझा बुलाकर झांड़फूंक करा ली जाये। बात मान ली गयी, ओझा बुलाया गया पर इससे भी कुछ बात ना बन सकी। थक हारकर सब सो गये।

बड़ी मुश्किल से रात कटी। सुबह होते ही छोटी बहू ने गीता पढ़नी फिर से शुरू की लेकिन थोड़ी देर में ही पालथी मारकर गीता सुनाती छुटकी जल्दी ही थक गयी, सबने बारी-बारी से गीता पढ़ी पर ऐसा करते हुये दिन भर लग गये। इधर जमीन पर दो दिनों से लेटे हुये रामधीन के बदन की हड्डियां दुखने लगीं, ईशारे से बिस्तर पर लिटाने की इच्छा व्यक्त की तो बहुएं नाक भौ सिकोडने लगी , आपस मे एक दूसरे के कान मे खुसुर पुसुर करते हुये कहने लगी - देखों तो! कितनी ख्वाईश बची है, इस बुड्ढे के मन में जीने की ।


रामधीन वापस बिस्तर पर लिटा दिया गया। पड़ेासी वैद्य ने खिचड़ी बनाकर खिलाने की सलाह दी, खिचड़ी रामधीन के सामने रखते ही पूरे थाली भर खिचड़ी एक ही बार में सफाचट कर गया, पर वह तो गर्म तवा में पानी की कुछ बूंदों की ही तरह था। इस तरह पूरे तीन दिन बीत गये, रामधीन के मौत की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही बहुओं के धैर्य की सीमाएं समाप्त होने लगीं। वे कभी भुनभुनातीं तो कभी अपने-अपने पतियों पर बरस पड़तीं ।


छोटी बहू कुछ ज्यादा ही गरम मिजाज थी । कहने लगी- चलिये जी, अपना सामान पेक करिये, हम अब और अधिक दिन तक नहीं ठहर सकते । आपको अपने छुट्टियों की परवाह ना भी हो तो मैं बिल्कुल नहीं ठहर सकती। मेरे पास इतनी छुट्टियां नहीं है कि किसी के मौत के इंतजार में बेठे-बैठे अपना वक्त गंवाती रहूं । दीदी, कुछ होने पर खबर भिजवा दीजीयेगा, वैसे मुझे नहीं लगता कि इनको अभी कुछ होगा ।पास बैठी जेठानी की ओर मुखातिब होते हुये छुटकी ने कहा।


बड़ी बहू भी क्रोध से उबल पड़ी- तो क्या हमने ठेका ले रखा है?अभी कुछ दिन पहले बाबूजी पूरे एक हफ्ते हमारे घर पर रूके थे, हमने सेवा की थी, तुम अपने पास एक दिन तो रखकर देखो।
दीदी, अब जाते-जाते मेरा मुंह ना खुलवाओ । छुटकी ने सामान ब्रीफकेस में समेटते हुये कहा।
हां, बोलो-बोलो। तुम क्या कहना चाहती हो, कहो ना, रूक क्यों गयी। बड़ी भी तमतमा गयी ।
दीदी, जिंदगी भर बाबूजी की जमा पूंजी लूट-लूट कर आप खाती रहीं, मेरी शादी के पहले तक तो आप ही कर्ता-धर्ता थी ना, अब आप नहीं करोगी तो क्या पड़ोस का रामलाल बाबूजी की गंदगी उठाने आयेगा।
देखो छुटकी तुम हद से ज्यादा बोल रही हो, अपनी जुबान पर लगाम रखो, वरना ठीक नहीं होगा।

दोनो बहुओं की तनातनी को देख भाईयों ने हस्तक्ष्ेाप करने की कोशिश की पर दोनों नाकाम रहे। दोनो ही झूमाझटकी पर उतर आये, पड़ोसियों ने शांत करने की कोशिश की तो मामला ले-देकर शांत हुआ, पर दोनो उसी वक्त बंटवारे की जिद्द पर अड़ गयी, बेटों ने भी इस झंझट से सदा-सदा के लिये मुक्ति पाने, बंटवारे पर अपनी मुहर लगा दीं ।पड़ोसियों ने समझाया कि पिता मृत्यु शैय्या पर पड़े हुये हैं,ऐसे मौके पर बंटवारा उचित नहीं होगा। पाई-पाई जोड़ने वाले पिता को अपने ही कमाये धन के बंटवारे पर सर्वाधिक कष्ट होता है। थोड़ी प्रतीक्षा और कर लो, अब इतने दिन धीरज रखा तो थोड़े दिन और सहीं ।


पर छोटी बहू थी, कि अड़ गयी, पड़ोसियों पर ही भड़क गयी, कहने लगी- अरे!इनको कुछ नहीं होगा चाचा। अभी सारे पाप निकलेंगे। पुण्यात्मा होते तब ना जल्दी मौत मिलती। सब यहीं दिखता है, स्वर्ग नरक सब यही है। हमारे प्रति सौतेला व्यवहार करते रहे, भगवान उसका भी तो फल देगा ना, चाचा । हम जिंदगी भर किराये के मकान में रहते रहे, पर कभी इन्होने नहीं कहा कि जाओ जमीन बेचकर एक बडा सा फ्लेट खरीद लो, आखिर मकान मालिक की खरी-खेाटी कब तक सुनते रहोगे। गांठ से एक आने नहीं निकले और बड़े भाई साहब यहां से बोरे में भर-भरकर राशन ले जाते रहे पर हमने कभी कुछ नहीं कहा। दोनो मिलकर कमाते हैं, तब बड़ी मुश्किल से गुजर चलती है।

बंटवारे की जब बात आयी तो खेत-खलिहान, घर सब बांट लिये गये । कपड़े, लत्ते और चादर भी बंाट लिये गये,एक नया चादर अतिरिक्त बच गया वह भी कोई किसी को देने को तैयार नहीं हुआ, आखिर में बीच से फाड कर वह भी आधा-आधा बांट लिया गया । आभूषणों की जब बारी-बार आयी तब रामधीन के जनेउ से चाबी निकालती बड़ी बहू जब थक गयी तो छोटी बहू ने जनेउ को ही कैंची से कुतर दिया और दोनो मिलकर सारे गहने बंाट डाले ।


रामधीन अपनी आंखों के सामने अपने खुद की मेहनत के बल पर खड़ी की गयी इमारत की नींव को ढहते हुये देख रहा था।उसके सपनों का महल उसके सामने तार-तार हो रहा था और वह बिस्तर पर असहाय पड़ा था ।दोनों बेटों के बीच बंटवारा तो हो गया पर पिता के मसले पर कोई बात ही करने को तैयार नहीं था । पड़ोसियों ने उन्हे लाख समझाया कि वृद्धावस्था में पिता का पालन पोषण भी आखिर उनका ही कर्तव्य है, उसे भी इस अवस्था में अपने संतान की तरह समझना चाहिये। दोनों में से कोई भी रख ले, यह तो पुण्य का काम है।

दोनो भाई इतना सुनते ही एक दूसरे का मंुह ताकने लगे। बड़े बेटे ने कहा - ऐसा करें, हम दोनो बारी-बारी छःछः महीने रखा करेंगे ।

पर, छोटी बहू फिर भड़क गयीं, कहने लगीं - हम इतने ठलहे नहीं हैं कि घर में इनकी गंदगी उठाते फिरें, जहां पाये वहीं थंूक दिया, जहां बैठे वहीं मक्खियां भिनभिनाने लगीं। सौ रूपये का खाना और एक आने का काम नहीं । मैं ये सब फालतू काम नहीं कर सकती । आप अपने घर रखिये, वैसे भी बाबूजी को फेमिली पेन्शन के हजार रूपये मिलते ही हैं, सरकार वृद्धावस्था पेन्शन के नाम पर भी अलग से ढाई सौ रूपये देती है, इन्हे आपके एहसान की जरूरत नहीं हैं।

लेकिन बड़ी बहू भी तैयार नहीं हुई, कहने लगीं - हम बेकार का आफत मोल नहीं लेंगे, इससे अच्छा इन्हे किसी वृद्धाश्रम में रख दो, चार बूढे़ लोगों के बीच रहेंगे, मन भी बहलेगा ।


बात दोनो बेटो को जंच गयी पडोसी कुछ कहते तो वो तो इनकी तू-तू मै-मै देखकर पहले ही जा चुके थे. दोनो ही सामान समेट अपने-अपने घर को जाने लगे, तय हुआ कि बड़ा भाई मनोज जाते समय शहर के एक वृद्धाश्रम "बसेरा" में पिता को छोड़ आयेगा । मनोज ने सामने की सीट पर रामधीन को बिठाया और पीछे की सीट पर अपनी पत्नी और नन्हे से बेटे को।


कार गेट के सामने खड़ी कर वहां की सारी औपचारिकताएं पूरी कर पिता को चौखटतक छोड़ते हुये बेटे मनोज ने कहा- बाबूजी, माफ करना, मशीन सी जिंदगी में बिल्कुल भी वक्त नहीं है, प्लीज बाबूजी बुरा मत मानना ।रामधीन की आंखों में आंसू भर आये, वह खड़ा हुआ एकटक मनोज को देखता रहा।


रामधीन आज बहुत दुखी था, उसे स्वयं पर बड़ी ग्लानि हो रही थी, वह इस बात पर गहन आत्ममंथन कर रहा था कि आखिर संतानों को संस्कार देने में उससे कहां चूक हो गयी? कैसे वह उन पुत्रों के लिये बोझ बन गया, जिनकी जिम्मेदारी को उसने हंसते-हंसते निर्वहन किया, उनकी खवाईशो को अपने शौक के तंदूर से उम्र भर सेंकता रहा,अपनी जिव्हा की तृप्ति को उनके हलक के नीचे उतरे हुये निवालों में महसूस करता रहा, उन बेटो के तनिक उफ पर उसने अपनी कितनी राते स्याह कर डाली, उसे वे क्षण याद आ रहे थे जब बच्चों की किताबों के लिये महाजनों के दरवाजों पर अपने स्वाभिमान की पगड़ी उतारकर कितनी बार उसने गिरवी रखी होगी पर कभी घर में किसी को तनिक भी आभास नहीं होने दिया।

वह बड़ा उदास हो गया, उसने रात में ही उस वृद्धाश्रम को छोड़ दिया और हांफते हुये किसी तरह वापस अपने गांव आ गया। एक वृद्ध पिता को भोजन की अतृप्त लालसा तो मौत नहीं देती, लेकिन अपनों की उपेक्षा उसे अंदर तक तोड़ डालती है, वृद्धावस्था में हर कदम पर चोंटिल होता उसका स्वाभिमान उसे मुर्दा बना देता है। वह आंसुओं से नहीं हृदय की गहराईयों से रोता है, उसके अंदर की जीने की सारी लालसा वहीं समाप्त हो जाती है जहां पर संतान उसे बोझ समझने लगते है।


उसकी सारी संपत्ति जिसे बेटों ने अपने बीच मौखिक तौर पर विभाजित कर लिया था, को रामधीन ने एक सिरे से खारिज करते हुये पूरी संपत्ति बेचकर एक ट्स्ट के हवाले कर दिया। बचे हुये रूपयों का उन्होने कई कमरों का एक बड़ा सा मकान बनवा दिया और गांव के प्रधान से आग्रह किया कि उसके मरने पर दाह संस्कार गांव के लोग ही कर दें, बेटों को खबर देने की आवश्यकता नहीं है। उस नये मकान की चाबी प्रधान को देते हुये उसने अनुरोध किया कि उसका बेटा जब गांव आये तो उसे यह चाबी सौंप दीजीयेगा ।

बेटा मनोज जब खेती बाड़ी की बुआई के सिलिसिले में घर आया तो घर पर टंगे एक बड़े से बोर्ड को देख हक्का बक्का रह गया, बोर्ड पर लिखा था - यह जमीन स्वर्गीय रामधीन की याद में बनाये जाने वाले स्कूल भवन और प्रांगण के लिये प्रस्तावित है।

गांव के प्रधान से मुलाकात की तो उसने सारी बातें बताते हुये कहा- यह सब उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप किया गया है, उन्होने नये मकान की चाबी आपको देने को कहा है।

मनोज चाबी लेकर उस बड़े से मकान में जैसे ही प्रविष्ट हुआ, बरामदे में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था - बेटे, मैं एक पिता हूं और कोई भी पिता अपने अंतिम क्षण तक सिर्फ संतानों के लिये जीता है। मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मैने तुम लोगों से जो उपेक्षा बर्दाश्त की, बहुओं के तीखे शब्दों के जो जख्म सहे, वह तुम दोनों को अपने बेटे और बहुओं से सहना पड़े । एक पिता अपना दुख तो हंसकर बर्दाश्त कर लेता है, पर संतानों को होने वाले किसी कष्ट की कोई छोटी सी कल्पना भी उसे अंदर तक झकझोर देती है। मैं यह मकान तुम्हे उस समय के लिये सौंपकर जा रहा हूं जब तुम बूढे हो जाओ और तुम्हारे संतान तुम्हे बोझ समझने लगें तो इसे एक वृद्धाश्रम का रूप देकर उन सबके लिये सहारा बनने की कोशिश करना जिनके बेटे तुम दोनों की तरह अधिकार की चेष्टा तो करते हैं पर कर्तव्यों को कहीं ना कहीं समय के प्रवाह मे भूल जाते हैं ।